श्री गणेश चतुर्थी

श्री गणेश चतुर्थी हिन्दू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है, जिसे भगवान गणेश के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। गणेश जी को “विघ्नहर्ता” (अवरोध दूर करने वाले), “सिद्धिदाता” (सफलता देने वाले), और “बुद्धि के देवता” माना जाता है। यह पर्व नए आरंभ, सफलता, और प्रगति के प्रतीक रूप में मनाया जाता है
गणेश चतुर्थी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है, जो भगवान श्री गणेश जी के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार भारत के लगभग सभी हिस्सों में मनाया जाता है, लेकिन महाराष्ट्र और कर्नाटक में विशेष रूप से धूमधाम से मनाया जाता है।
Ganesh Chaturthi 2025
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाएगा, जो बुधवार, 27 अगस्त 2025 को है। यह पर्व भगवान गणेश के जन्म का उत्सव है। इस दिन गणपति की स्थापना की जाती है और 10 दिनों तक पूजा-उत्सव चलता है।
संक्षेप में:
- गणेश चतुर्थी तिथि: 27 अगस्त 2025 (बुधवार)
- शुभ स्थापना मुहूर्त: सुबह 11:06 बजे से दोपहर 1:40 बजे तक
इस मुहूर्त में गणेश जी की स्थापना करने से विशेष पुण्य और शुभता मिलती है। वहीं, स्थापना के बाद विधिपूर्वक पूजा-अर्चना तथा मंत्रों का जाप किया जाता है।
गणेश पूजा विधि
गणेश पूजा विधि इस प्रकार है, जो सामान्यत: गणेश चतुर्थी या अन्य अवसरों पर गणेश जी की पूजा में अपनाई जाती है:
- शुद्धि और तैयारी: सबसे पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल और घर की सफाई करें।
- मूर्ति स्थापना: गणेश जी की मूर्ति को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पूजा स्थल पर रखें। मूर्ति स्थापना से पहले थोड़े अक्षत (बिना टूटे चावल) अर्पित करें।
- कलश स्थापना: गणेश जी के दाईं ओर कलश रखें जिसमें आम के पत्ते, सुपारी, सिक्का, नारियल और लाल वस्त्र बांधा हो। कलश पर दीपक जलाएं।
- पूजा मंत्र और संकल्प: हाथ में फूल, फल, सुपारी, अक्षत आदि लेकर संकल्प लें और मंत्र पढ़ें। उदाहरण मंत्र — “ॐ गं गणपतये नमः”
- आवाहन और प्राण प्रतिष्ठा: गणपति की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा के लिए मंत्र पढ़ें जैसे — “ॐ सिद्धि-बुद्धि-सहिताय श्रीमहागणाधिपतये नमः”
- स्नान और आचमन: गणेश जी को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से स्नान कराएं, फिर जल से साफ करें।
- वस्त्र और आभूषण: गणेश जी को लाल वस्त्र पहनाएं और सिंदूर-चंदन से तिलक करें।
- नैवेद्य समर्पण: मोदक, फल, पान सुपारी, मिठाई आदि अर्पित करें। दूर्वा और बेलपत्र चढ़ाएं।
- पूजा समाप्ति: फूलों से अन्त्यकुंड लगाएं, आरती करें और गणेश स्तोत्र या मंत्र जपें।
- प्रसाद वितरण करें और गणेश जी से आशीर्वाद लें।
पूजा के दौरान कुछ प्रमुख मंत्रों का जाप होता है जैसे:
- “ॐ गं गणपतये नमः”
- “गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्…”
- “ऊं गं गणपतये इहागच्छ इह सुप्रतिष्ठो भव”
यह पूजा विधि गणेश जी की स्थापना, पूजा, आरती और प्रसाद वितरण तक विस्तारित होती है, जो भक्तों के जीवन में सुख, समृद्धि और विघ्न-नाशक होती है।
संक्षेप में गणेश पूजा विधि में मूर्ति स्थापना, संकल्प, प्राण प्रतिष्ठा, स्नान, वस्त्र अर्पण, पुष्पहरूण, नैवेद्य, आरती और प्रसाद वितरण मुख्य अङ्ग हैं।
श्री गणेश आरती इस प्रकार है:
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।
एकदन्त दयावन्त, चार भुजाधारी।
माथे पर तिलक सोहे, मूसे की सवारी।
पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा।
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।
अँधे को आँख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया।
सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।
दीनन की लाज राखो, शम्भु सुतवारी।
कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी।
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।
यह आरती गणपति जी की पूजा के समय गाई जाती है और उनके आशीर्वाद के लिए समर्पित होती है।
अगर आप चाहें तो इसके साथ गणेश जी के कुछ मंत्र और चालीसा भी गा सकते हैं जो पूजा को और भी प्रभावशाली बनाते हैं।
पर्व की विशेषताएँ
- इस दिन घरों और सार्वजनिक स्थानों पर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित की जाती है।
- प्रतिमा स्थापित करने के बाद, नौ या दस दिनों तक गणेश जी की पूजा, आरती, मंत्रोच्चार, और विशिष्ट व्यंजन (जैसे मोदक) का भोग लगाया जाता है, जो गणेश जी को विशेष रूप से प्रिय हैं।
- लोग व्रत भी रखते हैं और ‘प्रसाद’ (भक्तों में बांटने हेतु खाने की चीज़) वितरित करते हैं।
उत्सव का समापन
त्योहार के अंत में, भगवान गणेश की प्रतिमा को बाजे-गाजे व जुलूस के साथ पास के नदी, तालाब या समुद्र में विसर्जित (डुबोया) जाता है। इस प्रक्रिया को गणपति विसर्जन कहते हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
गणेश चतुर्थी का सार्वजनिक रूप में उत्सव शिवाजी महाराज के समय शुरू हुआ माना जाता है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बाल गंगाधर तिलक ने इसे सांस्कृतिक एकता और जागृति के रूप में प्रोत्साहित किया।
महत्त्व और मान्यता
- भगवान गणेश को नई शुरुआत के देवता, विघ्नहर्ता (विघ्नों का हरण करने वाले) और विद्या के संरक्षक माना जाता है। माना जाता है कि इन दस दिनों के दौरान गणेश जी स्वयं पृथ्वी पर आकर अपने भक्तों को आशीर्वाद देते हैं।
भगवान गणेशजी के जन्म की सबसे प्रसिद्ध कथा
- माता पार्वती ने अपने शरीर के मैल (उबटन) से एक बालक बनाया था और उसमें प्राण डाल दिए। पार्वती जी ने अपने पुत्र गणेश को अपने स्नान कक्ष की रखवाली का आदेश दिया।
- जब भगवान शिव लौटकर आए, तो गणेशजी ने उन्हें रोक लिया क्योंकि उन्हें अपनी मां की आज्ञा का पालन करना था। ग़ुस्से में आकर भगवान शिव ने गणेशजी का सिर काट दिया।
- यह देखकर माता पार्वती बहुत दुःखी हो गईं और सृष्टि के विनाश की धमकी दी। तब भगवान शिव ने गणेश के धड़ पर हाथी का सिर जोड़ दिया और उन्हें नया जीवन दिया। इसी कारण गणेश जी का सिर हाथी के समान है और नाम ‘गजानन’ या ‘गणपति’ पड़ा।
- गणेश चतुर्थी पर्व दरअसल भगवान गणेश के जन्म की स्मृति में मनाया जाता है। पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में यह तिथि विशेष मानी गई है — भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को ही गणेश जी का जन्म हुआ था।
- इस दिन गणेश जी की पूजन, स्थापना और उनके शक्तिशाली रूप (गजानन, विघ्नहर्ता) का सम्मान किया जाता है। पर्व के दौरान गणेशजी की जन्म कथा पढ़ना, सुनना, और समझना पूजन का खास हिस्सा है; इससे भक्तों में आस्था और विश्वास बढ़ता है कि गणेश जी विघ्नों को दूर करेंगे और जीवन में शुभता लाएंगे.
- गणेश जी अपने रूप से हमें यह बताते हैं कि वह हमारे भीतर चेतना, ख़ुशी और ज्ञान का प्रतीक हैं। इस पर्व का उद्देश्य आंतरिक ‘गणेश तत्व’ को जागृत करना है— यानी हमारे भीतर की सकारात्मकता, विवेक और ज्ञान का प्रकट होना।
गणेशजी का मस्तक हाथी का क्यों बना
इसके पीछे मुख्य पौराणिक कथा है:
- जब भगवान शिव ने अनजाने में गणेश जी का बाल्यकाल में सिर काट दिया, माता पार्वती बहुत दुखी हुईं और संसार की स्थिति बिगड़ने लगी. तब शिव जी ने अपने गणों से कहा कि उत्तर दिशा में जो भी पहला जीव मिले, उसका सिर ले आएं। उत्तर दिशा को ज्ञान की दिशा भी कहा जाता है।
- शिवगणों को सबसे पहले हाथी (इंद्र का ऐरावत) मिला, उसका सिर लाकर शिव जी ने गणेश जी के शरीर से जोड़ दिया और उन्हें पुनः जीवित कर दिया। इसलिए गणेश जी का सिर हाथी का है.
- कुछ पुराणों में ‘गजासुर’ की कथा भी सुनाई जाती है — जिसमें गजासुर नामक राक्षस को वरदान के कारण उसका सिर गणेश जी को लगाया जाता है, जिससे गजासुर को परम सम्मान मिलता है.
- हाथी का सिर जोड़ने के पीछे एक तात्त्विक संदेश भी है— हाथी का सिर बुद्धिमत्ता, शांत स्वभाव और शक्ति का प्रतीक है, जो गणेश जी के गुणों को दर्शाता है.
इसलिए, गणेश जी का मस्तक हाथी का बना — यह घटना उन्हें गजानन और गणपति शीर्ष सत्ता के रूप में स्थापित करती है।
विशेष बातें
- गणेश जी की पूजा किसी भी शुभ कार्य या नये आरंभ से पहले की जाती है।
- गणेश चतुर्थी पर उनकी पूजा से विघ्नों का नाश और कार्य सिद्धि की कामना की जाती है।
- यह पर्व सामाजिक एकता, भक्ति और प्रारंभ की ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
गणेश चतुर्थी का मुख्य उद्देश्य है:
- भगवान गणेश जी की पूजा व आराधना करना, जो विघ्नहर्ता और विद्या, बुद्धि व समृद्धि के देवता हैं। इस दिन गणेश जी के जन्म का उत्सव मनाया जाता है — उन्हें प्रथम पूज्य देवता माना जाता है, इसलिए किसी भी शुभ कार्य या नई शुरुआत के पहले उनकी पूजा की जाती है।
- इस पर्व के दौरान लोग अपने जीवन से विघ्न-बाधाओं का नाश करने, सुख-समृद्धि, बुद्धि व सफलता की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।
- यह पर्व सामाजिक एकता, समुदाय और सद्भावना बढ़ाने का संदेश भी देता है — लोग एक जगह इकट्ठा होकर उत्साहपूर्वक मूर्ति स्थापना, पूजा, भजन आदि करते हैं।
- प्रतिमा विसर्जन के साथ यह संकेत भी दिया जाता है कि जीवन में परिवर्तन और निरंतरता जरूरी है, और हर अंत एक नई शुरुआत का अवसर होता है.
- भगवान गणेश का आशीर्वाद प्राप्त करना
- विघ्नों का नाश व जीवन में शुभता/समृद्धि की कामना
- सामाजिक साझेदारी और सद्भावना को बढ़ाना
- जीवन में नयापन, सकारात्मकता और आशा जगाना
निष्कर्ष:
गणेश चतुर्थी आनंद, एकता, शक्ति, विद्या व समृद्धि का प्रतीक है — इसमें भक्तगण अपने आराध्य को विशेष रूप में आमंत्रित करते हैं, पूजते हैं और उत्सव के अंत में शान से विदा करते हैं कि वे वापस अगले वर्ष पुनः पधारेंगे।
