डॉ. राजेंद्र प्रसाद: भारत के पहले राष्ट्रपति

डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति, महान स्वतंत्रता सेनानी और भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण स्तंभ थे। उनका जीवन संघर्ष, त्याग, सेवा और शिक्षा की उत्कृष्ट मिसाल है।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 को बिहार के छपरा जिले के जीरादेई गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम महादेव सहाय और माता का नाम कमलेश्वरी देवी था। वे अत्यंत मेधावी छात्र थे। प्रारंभिक शिक्षा गाँव में हुई, इसके बाद उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम.ए. और एल.एल.बी. की डिग्री प्राप्त की। पढ़ाई के दौरान उनकी सादगी और ईमानदारी की सभी सराहना करते थे।
जन्म और परिवार
उनके पिता महादेव सहाय संस्कृत और फारसी के विद्वान थे, जबकि माता कमलेश्वरी देवी धर्मपरायण महिला थीं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे थे, जिससे परिवार में सभी का उनसे विशेष स्नेह था।
प्रारंभिक शिक्षा
राजेंद्र प्रसाद की प्रारंभिक शिक्षा घर और गांव में हुई। पाँच वर्ष की आयु में उन्हें एक मौलवी के पास भेजा गया, जहाँ उन्होंने फारसी पढ़ी। इसके बाद हिंदी और अंकगणित की शिक्षा ली। प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने छपरा जिला स्कूल में प्रवेश लिया, जहाँ उनकी प्रतिभा की काफी प्रशंसा हुई।
उच्च शिक्षा
1902 में, 18 वर्ष की उम्र में, उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा प्रथम स्थान पर उत्तीर्ण की और प्रेसिडेंसी कॉलेज, कोलकाता में दाखिला लिया। यहाँ उन्हें छात्रवृत्ति भी मिली। उन्होंने स्नातक में प्रथम श्रेणी प्राप्त की और फिर एमए व कानून में उच्च शिक्षा ग्रहण की। शिक्षा के दौरान वे महात्मा गांधी के विचारों से अत्यंत प्रभावित हुए।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की शिक्षा ने उन्हें आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख नेता और भारत के पहले राष्ट्रपति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वकालत और अकादमिक उपलब्धियाँ
डॉ. प्रसाद ने कोलकाता में वकालत शुरू की। वे अर्थशास्त्र के प्रोफेसर भी रहे और विद्यार्थियों के बीच खूब लोकप्रिय थे। बाद में उन्होंने 1911 में नियमित वकालत शुरू की और 1920 तक कोलकाता व पटना में वकील रहे। इस बीच वे सामाजिक कार्यों, बाढ़ और भूकंप राहत के प्रयासों में भी सक्रिय रहे।
वकालत क्षेत्र में उपलब्धियाँ
- उन्होंने 1911 में वकालत शुरू की और जल्द ही देश के प्रमुख वकीलों में गिने जाने लगे।
- 1916 में उन्हें बिहार और ओडिशा उच्च न्यायालय में नियुक्ति मिली।
- कोलकाता उच्च न्यायालय में भी उन्होंने अपनी सेवाएँ दीं और “बिहार लॉ वीकली” जैसी पत्रिका की स्थापना की।
- उनकी साख उत्कृष्ट वकील के तौर पर बनी; वे सामाजिक न्याय के मुद्दों पर हमेशा आगे रहते थे।
- 1920 में असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए उन्होंने वकालत का करियर छोड़ दिया।
शैक्षणिक योगदान
- राजेंद्र प्रसाद एक बेहद योग्य शिक्षक रहे; वे अर्थशास्त्र के प्रोफेसर भी बने और छात्रों के बीच प्रिय थे।
- उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विधि में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की।
- शिक्षाविद्-रूप में उनका योगदान कानून, समाजशास्त्र और पत्रकारिता क्षेत्र में भी रहा।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की वकालत और अकादमिक उपलब्धियाँ उनके बहुआयामी व्यक्तित्व की सशक्त पहचान हैं, जो आगे स्वतंत्रता आंदोलन व संविधान निर्माण में उनकी भूमिका के लिए नींव बनी।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
राजेंद्र प्रसाद महात्मा गांधी के नेतृत्व से बेहद प्रभावित थे। उन्होंने 1917 में चंपारण आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और किसानों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। वे असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन सहित कई राष्ट्रीय आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका में रहे। स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते हुए कई बार जेल भी गए।
स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय योगदान
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 1917 में चंपारण सत्याग्रह में भाग लिया, जो गांधीजी के नेतृत्व वाला पहला सफल किसान आंदोलन था।
- वे असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन जैसे सभी प्रमुख आंदोलनों में शामिल रहे और कई बार जेल गए।
- बिहार में किसानों और मजदूरों के हित में उन्होंने संगठन बनाए और आंदोलनों का नेतृत्व किया जिससे स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूती मिली।
- गांधीजी ने उन्हें साबरमती आश्रम के मॉडल पर सदाकत आश्रम स्थापित करने का दायित्व दिया, जहां सामाजिक सुधार के कार्य हुए।
- स्वतंत्रता संग्राम में उनकी सादगी, नैतिकता और दृढ़ संकल्प ने उन्हें जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय बनाया।
अन्य योगदान
17947 में, वह संविधान सभा के अध्यक्ष चुने गए, भारतीय संविधान के निर्माण की दिशा में उनका अमूल्य योगदान रहा। स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूती दी।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान न केवल संगठक और नेता के रूप में था, बल्कि वे एक आदर्श राजनेता और प्रशासनिक शिक्षक भी थे जिन्होंने भारत के राष्ट्रीयता निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में भूमिका
डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली भूमिका निभाई। वे कांग्रेस पार्टी के तीन बार अध्यक्ष रहे (1934, 1939, और 1947), जहाँ उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न महत्वपूर्ण चरणों का नेतृत्व किया और पार्टी का मार्गदर्शन किया।
कांग्रेस में उनकी भूमिका और कार्य
- 1911 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य बने और जल्दी ही पार्टी में अपने नेतृत्व और कार्यों के कारण प्रसिद्ध हुए।
- उन्होंने 1930-1932 में लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया, जहां उन्होंने देश के हितों की प्रभावी पैरवी की।
- 1920 में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के लिए अपनी वकालत छोड़ दी।
- उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने कई आंदोलनों जैसे नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन, और असहयोग आंदोलन को मजबूती दी।
- 1946 में उन्हें संविधान सभा का अध्यक्ष चुना गया, जहाँ उन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो कांग्रेस के भीतर उनकी व्यापक काबिलियत का प्रमाण था।
- वे महात्मा गांधी के बेहद करीबी सहयोगी थे और कांग्रेस की नीतियों एवं रणनीतियों को गांधी के आदर्शों के अनुरूप ढालने में मदद की।
- उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने स्वतंत्रता संग्राम को एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में सफलतापूर्वक संचालित किया।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का संगठन कौशल, नेतृत्व क्षमता और दूरदर्शिता ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को स्वतंत्रता संग्राम के निर्णायक चरणों में एक मजबूत और प्रभावी पार्टी बनाया। उनका योगदान कांग्रेस के इतिहास में अविस्मरणीय है और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख स्तंभ के रूप में मान्यता प्राप्त है।
संविधान सभा और राष्ट्र निर्माण
आजादी के बाद, डॉ. राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का अध्यक्ष चुना गया। उनके नेतृत्व में भारतीय संविधान का निर्माण हुआ, जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। उनकी ईमानदार नेतृत्व शैली और निष्पक्षता के लिए उन्हें खूब सम्मान मिला।
भारत के प्रथम राष्ट्रपति

डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति थे, जिन्होंने 26 जनवरी 1950 को पद संभाला और 13 मई 1962 तक कार्य किया।वे लगातार 12 वर्षों तक राष्ट्रपति पद पर रहे (1950-1962)। उनके कार्यकाल में भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे की नींव मजबूत हुई। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महान नेता, वकील, और विद्वान थे जिन्होंने देश के लोकतांत्रिक संस्थानों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में जीवन
- उन्होंने 1950 में भारत के गणराज्य बनने के बाद पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली और लगातार तीन कार्यकालों (1950-1952, 1952-1957, 1957-1962) के लिए इस पद पर रहे।
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपने राष्ट्रपति काल में देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत करने और संविधान के पालन को सुनिश्चित करने के लिए काम किया।
- वे एक सादगीपूर्ण, नैतिक और दूरदर्शी नेता थे, जिनका नेतृत्व भारतीय राजनीति और प्रशासन में एक आदर्श स्थापित करता था।
- उन्होंने 1962 में स्वास्थ्य खराब होने के कारण सार्वजनिक जीवन से संन्यास ले लिया, उसी वर्ष उन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न, से नवाजा गया।
महत्व और विरासत
डॉ. राजेंद्र प्रसाद को ‘राजेंद्र बाबू’ के नाम से सम्मानित किया जाता था। उनका राष्ट्रपति काल भारतीय गणराज्य के शुरुआती और संवेदनशील वर्षों में स्थिरता और विकास का काल माना जाता है। उन्होंने भारत के लोकतंत्र और संविधान को मजबूती प्रदान की और एक आदर्श राष्ट्राध्यक्ष के रूप में देशवासियों के दिलों में अपनी जगह बनाई।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जीवन समर्पण, शिक्षा, और देशभक्ति का प्रतीक है, जिन्होंने स्वाधीन भारत को संवैधानिक रूप से एकजुट और मजबूत बनाने में अपना अमूल्य योगदान दिया।
राष्ट्रपति काल की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ
डॉ. प्रसाद ने राष्ट्रपति रहते हुए सामाजिक कल्याण, शिक्षा, लोकतांत्रिक मूल्यों और गैर पक्षपाती प्रशासन को प्राथमिकता दी। उन्होंने प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत कार्यों को व्यक्तिगत रूप से नेतृत्व दिया और करोड़ों रुपये सहायता कोष में जमा किए। देशवासियों के प्रति उनके समर्पण और नीतियों ने भारत का मार्ग प्रशस्त किया।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद के राष्ट्रपति काल (1950-1962) में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ और देश के लिए अमूल्य योगदान रहे। वे भारत के इतिहास में सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले राष्ट्रपति थे और उनका कार्यकाल भारतीय लोकतंत्र के सुदृढ़ीकरण एवं सामाजिक-आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण काल था।
महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 26 जनवरी 1950 को भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली और 12 वर्षों तक इस पद पर रहे, जो इस पद पर सबसे लंबा कार्यकाल है।
- वे भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष भी थे और संविधान के निर्माण में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही, जो संवैधानिक लोकतंत्र की नींव थी।
- राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने संवैधानिक अधिकारों का सम्मान करते हुए सरकार और प्रधानमंत्री के प्रति निष्पक्ष और संवैधानिक भूमिका निभाई।
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने देश के सामाजिक कल्याण और शिक्षा के क्षेत्र को बढ़ावा दिया, जिससे समृद्धि और विकास को बल मिला।
- गुजरात के सोमनाथ शिव मंदिर के जीर्णोद्धार जैसे सांस्कृतिक पुनरुद्धार कार्यों को उन्होंने प्रोत्साहित किया, जो राष्ट्रीय एकता का प्रतीक हैं।
- 1934 के बिहार के विनाशकारी भूकंप के बाद राहत कार्यों में उनकी सक्रिय भूमिका ने उनकी लोकप्रियता और नेतृत्व क्षमता को और बढ़ाया, जो राष्ट्रपति बनने के बाद भी उनकी छवि रही।
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सादगी और आदर्शों के साथ देश का नेतृत्व किया, जिससे वे जनता के अतिविश्वसनीय नेता बने।
- 1962 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें भारत रत्न, भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, से नवाजा गया।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद के राष्ट्रपति काल की ये उपलब्धियाँ भारतीय गणराज्य के मजबूत लोकतंत्र और सामाजिक समरसता के निर्माण में मील का पत्थर साबित हुईं। उनका जीवन देश सेवा, संविधान की रक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पित था।
सम्मान और पुरस्कार
डॉ. राजेंद्र प्रसाद को उनके जीवनकाल में और बाद में कई सम्मानों और पुरस्कारों से नवाजा गया, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न है।राजेंद्र प्रसाद को 1962 में ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया गया जो भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।
- भारत रत्न (1962): डॉ. राजेंद्र प्रसाद को 1962 में भारत सरकार द्वारा भारत रत्न से सम्मानित किया गया। यह भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, जो देश की सेवा में असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है।
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति थे जिन्होंने भारत रत्न पुरस्कार की स्थापना भी की। यह पुरस्कार 2 जनवरी 1954 को उनके द्वारा स्थापित किया गया था।
- उन्हें उनकी सादगी, नैतिकता, और देशभक्ति के लिए व्यापक सम्मान प्राप्त था, और वे ‘देश रत्न’ के नाम से भी जाने जाते थे, जिसका अर्थ है “राष्ट्र का गहना”।
- डॉ. प्रसाद ने अपने जीवनकाल में स्वतंत्रता संग्राम, संविधान निर्माण, और देश के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में बेहद महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसकी वजह से उन्हें यह विशेष सम्मान मिला।
- उनके सम्मान में बिहार सरकार ने 2012 में उनकी 128वीं जयंती पर भी ‘देश रत्न’ की उपाधि से सम्मानित किया था।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का यह समर्पण, नेतृत्व, और सेवा के प्रति अटूट भक्ति उनके सम्मान और पुरस्कारों के माध्यम से आज भी भारतीय जनता के दिलों में जीवित है।
साहित्य, शिक्षा और विचारशीलता
डॉ. राजेंद्र प्रसाद एक उत्कृष्ट लेखक भी थे। उन्होंने हिंदी, अंग्रेज़ी और उर्दू में कई पुस्तकें लिखीं। उन्हें ‘राजेंद्र बाबू’ के नाम से सम्मान मिलता था। वे कहते थे, “देश की सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है,” और “वास्तविक स्वतंत्रता वही है जब हम उसका सही उपयोग करें”।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद एक कुशल लेखक, शिक्षाविद् और विचारक थे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक सुधारों पर कई महत्वपूर्ण साहित्यिक रचनाएँ कीं। उनकी भाषा सरल, सुबोध और प्रभावशाली थी, जो आम जनता के लिए समझने में आसान थी।
साहित्यिक रचनाएँ
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद की प्रमुख पुस्तकें हैं: भारतीय शिक्षा, गांधीजी की देन, शिक्षा और संस्कृत साहित्य, मेरी आत्मकथा, बापूजी के कदमों में, मेरी यूरोप यात्रा, संस्कृत का अध्ययन, चंपारण में महात्मा गांधी और खादी का अर्थशास्त्र आदि।
- उन्होंने अनेक भाषण भी दिए, जिनके संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जिनमें उनकी विचारशीलता, नैतिकता और देशभक्ति स्पष्ट रूप से झलकती है।
- उनकी लेखनी में विभिन्न भाषाओं के शब्दों का सुन्दर मिश्रण देखा जाता है, जिसमें संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं का प्रभाव दिखता है।
शिक्षा और विचारशीलता
- वे शिक्षा के महत्तव में विश्वास करते थे और भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए शिक्षा को आधार मानते थे।
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने हिंदी और संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया, वे स्वयं हिंदी के उत्साही प्रचारक थे।
- सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों पर उनके लेखन और विचार भारतीय समाज को जागरूक करने वाले थे, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम और बाद की पीढ़ी के लिए दिशा निर्धारित की।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का साहित्य और उनकी शिक्षाविद् दृष्टि भारतीय राष्ट्र निर्माण के अभिन्न अंग रही और आज भी उनकी कविताएँ, पुस्तकें और विचार भारत के युवाओं को प्रेरणा देते हैं।
जीवन के अंतिम वर्ष और मृत्यु
राष्ट्रपति पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वे पटना के सदाकत आश्रम में रहने लगे। 28 फरवरी 1963 को वहाँ उनका निधन हो गया। उनकी पत्नी का नाम राजवंशी देवी था।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद के जीवन के अंतिम वर्ष और उनकी मृत्यु उनके सादगीपूर्ण और समर्पित जीवन का प्रतिबिंब थे। 1962 में, लगभग 12 वर्षों तक भारत के प्रथम राष्ट्रपति रहने के बाद, उन्होंने स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया।
जीवन के अंतिम वर्ष
राष्ट्रपति पद से निवृत्त होने के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद पटना के सदाकत आश्रम में रहने लगे, जो महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर स्थापित था। उन्होंने यहाँ शांति और साधना के बीच अपना शेष जीवन बिताया, अपनी सरलता और अनुशासन को बनाए रखा। वे अपने जीवन के अंतिम दिनों तक शिक्षा, समाज सेवा और राष्ट्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखे।
मृत्यु
28 फरवरी 1963 को रात 10 बजकर 10 मिनट पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद का निधन हो गया। उस दिन वे पटना विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह में भाषण देने के लिए जा रहे थे, लेकिन वे उस कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सके क्योंकि बीमारी ने उन्हें जकड़ लिया था। उनका निधन भारत के लिए एक महान क्षति थी, लेकिन उनकी शिक्षा, सादगी, और नेतृत्व की विरासत आज भी जीवित है।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जीवन और कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत है, जिन्होंने पूरे देश में शिक्षा, नैतिकता और समर्पण का दीप जलाया।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की विरासत
उनका जीवन शिक्षा, तपस्या और उच्च आदर्शों से भरा हुआ था। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बने। सामाजिक न्याय, शिक्षा और लोकतंत्र की ओर उनका योगदान अमूल्य है। उनके जीवन के आदर्श आज भी सभी भारतीयों के मार्गदर्शन का स्रोत हैं।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की विरासत समर्पण, नेतृत्व, शिक्षा और लोकतंत्र की मजबूत नींव का प्रतीक है। वे न केवल भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी थे, बल्कि स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में भी उन्होंने देश के लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थान को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विरासत के प्रमुख पहलू
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद की विनम्रता, सादगी, और जनसेवा की प्रतिबद्धता आज भी भारत के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। उन्होंने देश के विकास में नैतिकता और कर्तव्य के महत्व को स्थापित किया।
- उन्होंने संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में भारतीय संविधान के निर्माण में मार्गदर्शन किया, जिसने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राष्ट्र बनाया।
- स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान और नेतृत्व ने भारत को ब्रिटिश शासन से आजाद कराने में निर्णायक भूमिका निभाई।
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सामाजिक समरसता, शिक्षा के प्रसार, और सांस्कृतिक पुनरुद्धार में भी महत्वपूर्ण कार्य किए, जिससे भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान मजबूत हुई।
- उनकी सादगी और नैतिकता का उदाहरण आज भी नेताओं और नागरिकों के लिए आदर्श बना हुआ है।
- पटना के सदाकत आश्रम में उनका निवास और उनके बैंक खाते जैसे प्रतीक उनकी जीवनशैली और मूल्यांकन को दर्शाते हैं, जो आज भी सम्मान के साथ याद किए जाते हैं।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की विरासत न सिर्फ़ उनके कृतित्व और पद से जुड़ी है, बल्कि उनके जीवन के आदर्श और मूल्य आज भी भारत के लिए प्रेरणा हैं। वे एक आदर्श नेता, शिक्षक और राष्ट्र सेवक थे, जिनकी छवि भारतीय इतिहास में अमिट है।
विशेष विचार
- “अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, हमारे तरीके अंतिम परिणाम की तरह ही शुद्ध होने चाहिए”।
- “संविधान न केवल कागज पर लिखे शब्द हैं, बल्कि यह हमारी स्वतंत्रता, अधिकार और कर्तव्यों का प्रतीक है”।
- “प्रगति का आधार शिक्षा है, और शिक्षा से ही हमारा समाज विकसित हो सकता है”।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की गाथा त्याग, समर्पण, शिक्षा और संयम की जीवंत मिसाल है, जिससे प्रत्येक भारतीय प्रेरणा ले सकता है।

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