लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक | Lokmany Bal Gangadhar Tilak

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में जिन महान क्रांतिकारियों, समाजसुधारकों और नेताओं ने स्वतंत्रता की भावना को जन-जन तक पहुँचाया, उनमें लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उन्हें “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा” के लिए सदा याद किया जाता है। तिलक न केवल एक राजनेता थे, बल्कि वे समाज सुधारक, शिक्षाविद्, लेखक, पत्रकार और जनता को संगठित करने वाले प्रेरणास्रोत भी थे। भारतवर्ष में सांस्कृतिक पुनर्जागरण लाने और अंग्रेजों के विरुद्ध जनआंदोलन खड़ा करने में उनका योगदान अद्वितीय है।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
- बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में हुआ था।
- उनके पिता गंगाधर रामचंद्र तिलक संस्कृत भाषा के विद्वान और शिक्षक थे।
- बाल गंगाधर तिलक की माता का नाम पार्वतीबाई गंगाधर तिलक था।
- उनकी शिक्षा पूना (अब पुणे) में हुई।
- उन्होंने गणित और संस्कृत में उल्लेखनीय प्रावीण्य प्राप्त किया।
- वे डीक्कन कॉलेज, पुणे से गणित में स्नातक (B.A.) और कानून (LL.B.) की पढ़ाई पूरी की
राष्ट्रीय चेतना का जागरण
19वीं शताब्दी का भारत गहरे सामाजिक अंधकार, अंग्रेजी दमन और शिक्षा की कमी से जूझ रहा था। उस समय भारतीय समाज आत्मविश्वास खो चुका था। तिलक ने युवावस्था से ही यह ठान लिया था कि वे अपने जीवन को भारतीय जनता के जागरण और स्वाधीनता को समर्पित करेंगे।
राष्ट्रीय चेतना का जागरण बाल गंगाधर तिलक के जीवन और कार्य का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था। उन्होंने भारतीय समाज में स्वराज्य (स्वशासन) का नारा देकर लोगों के मन में स्वतंत्रता की लौ जलाई। तिलक ने समझा कि केवल राजनीतिक सुधारों की मांग से काम नहीं चलेगा, जनता में एकजुटता, आत्म-सम्मान और राष्ट्रीय चेतना का विकास आवश्यक है।
उन्होंने शिक्षा, साहित्य, सामाजिक त्योहारों और पत्रकारिता के माध्यम से जनता को जागरूक किया। तिलक ने सार्वजनिक गणेशोत्सव और शिवाजी जयंती जैसे सांस्कृतिक आयोजनों को राष्ट्रीय एकता और समाज को संगठित करने का मंच बनाया। उन्होंने स्वदेशी और बहिस्कार आंदोलन चलाकर आर्थिक रूप से भारतीयों को आत्मनिर्भर बनाने की भी दिशा दी।
तिलक ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गरम दल का नेतृत्व किया और स्वराज्य को जनता का जन्मसिद्ध अधिकार बताया। उनका नारा था, “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।” इस नारे ने लाखों भारतीयों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष के लिए प्रेरित किया।
इसके अलावा उन्होंने सामाजिक असमानताओं को दूर करने और शिक्षा प्रणाली सुधारने पर भी जोर दिया, जिससे समाज के हर वर्ग में राष्ट्रीय चेतना का विकास हो सके। उनके इन प्रयासों ने भारत में एक संगठित, सजग, सक्रिय राष्ट्रीय आंदोलन की नींव डाली, जो बाद में स्वतंत्रता संग्राम की मुख्य धारा बना।
संक्षेप में, बाल गंगाधर तिलक ने भारतीय समाज में राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक सभी स्तरों पर राष्ट्रीय चेतना को जगाकर स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूती दी.
शिक्षा क्षेत्र में योगदान
तिलक का मानना था कि यदि भारतीय समाज को जागरूक बनाना है तो इसके लिए सबसे आवश्यक है स्वदेशी शिक्षा प्रणाली।
बाल गंगाधर तिलक ने शिक्षा क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका दृष्टिकोण था कि शिक्षा केवल साक्षरता (पढ़ाई-लिखाई) देना नहीं है, बल्कि यह समाज और राष्ट्र के जागरण एवं पुनर्निर्माण का गुरुत्वाकर्षण केंद्र है।
मातृभाषा में शिक्षा
तिलक का मानना था कि शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। उन्होंने अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यताओं और इसके कारण उपजी हीन भावना के खिलाफ आवाज उठाई। उनके अनुसार मातृभाषा में शिक्षा से छात्र जल्दी सीखते हैं और समाज के संस्कार एवं संस्कृति को बेहतर समझ पाते हैं।
व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षा
तिलक ने शिक्षा के व्यावहारिक पक्ष पर भी जोर दिया। उनके अनुसार शिक्षा ऐसी हो जो रोजगार और आत्मनिर्भरता के लिए उपयोगी हो। इसलिए तकनीकी और व्यवसायिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करना आवश्यक था।
चरित्र निर्माण
तिलक ने शिक्षा के सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य के रूप में छात्र के चरित्र निर्माण की बात कही। उनका मानना था कि एक मजबूत चरित्र वाला युवा समाज और राष्ट्र के निर्माण में सक्षम हो सकता है। इसलिए शिक्षा में यह पहलू प्रमुख हो।
भारतीय संस्कृति और मूल्य
तिलक ने भारतीय प्राचीन ग्रंथों, संस्कृति और इतिहास को शिक्षा प्रणाली में स्थान देने पर जोर दिया। वे चाहते थे कि विद्यार्थियों को शिवाजी, महाराणा प्रताप जैसे महापुरुषों से प्रेरणा मिले और भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान पैदा हो।
शिक्षा संस्थानों की स्थापना
तिलक ने डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना की, जिसके माध्यम से उन्होंने स्वदेशी शिक्षा को बढ़ावा दिया। उन्होंने “न्यू इंग्लिश स्कूल” और फर्ग्यूसन कॉलेज जैसे संस्थानों की नींव रखी ताकि शिक्षा व्यापक और स्वदेशी हो।
शिक्षा और सामाजिक सुधार
तिलक ने माना कि शिक्षा सामाजिक बुराइयों को दूर करने का सबसे प्रभावी माध्यम है। उनका प्रयास यह भी था कि शिक्षा के द्वारा सामाजिक असमानताओं और जातिवाद को समाप्त किया जा सके।
संक्षेप में, बाल गंगाधर तिलक की शिक्षा दृष्टि आत्मनिर्भर, चरित्रवान और संस्कृतिमय समाज की रचना पर आधारित थी, जिसमें मातृभाषा, तकनीकी शिक्षा और भारतीय संस्कृति का सशक्त स्थान हो। उनके विचार आज की शिक्षा नीतियों में भी उपयोगी और प्रासंगिक माने जाते हैं।
डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी
1879 में उन्होंने अपने साथियों गोपाल गणेश आगरकर और विष्णुशास्त्री चिपलूणकर के साथ मिलकर “न्यू इंग्लिश स्कूल” की स्थापना की। इसके बाद 1884 में उन्होंने डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी की भी नींव रखी।
- उद्देश्य था भारतीयों के हाथों में ऐसी शिक्षा देना जो उन्हें आत्मनिर्भर बनाए।
- आगे चलकर यह संस्था फर्ग्यूसन कॉलेज के रूप में विकसित हुई, जिसने अनेक स्वतंत्रता सेनानियों को तैयार किया।
पत्रकारिता और राष्ट्रीयतावादी विचारधारा का प्रचार
तिलक का मानना था कि समाचार पत्र जनता को शिक्षित करने और जागृत करने के सबसे सशक्त माध्यम हैं।
बाल गंगाधर तिलक ने पत्रकारिता को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे प्रभावी हथियार बनाया। उन्होंने 1881 में विष्णु शास्त्री चिपलूणकर के साथ मिलकर मराठी में ‘केसरी’ और अंग्रेज़ी में ‘मराठा’ नामक दो प्रतिष्ठित पत्रिकाओं की स्थापना की। बाद में 1891 में तिलक ने इन दोनों पत्रिकाओं का सम्पूर्ण प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया।
उनकी पत्रकारिता ने ब्रिटिश राज की क्रूरता, अन्याय और दमन को बेधड़क उजागर किया। तिलक की लेखनी में राष्ट्रीयता की आभा झलकती थी और वे सीधे-सीधे जनता में स्वराज की भूख जागृत करने में लगे रहे। केसरी और मराठा के माध्यम से उन्होंने स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन का प्रचार किया, जनता को राजनीतिक रूप से सक्रिय किया और英国 शासन के विरुद्ध उग्र आवाज उठाई।
उनके लेख इतने प्रभावशाली और तर्कपूर्ण थे कि कई बार उन्हें जेल भी जाना पड़ा। तिलक की पत्रकारिता का उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं था, बल्कि राष्ट्रहित के सवालों को जनता के सामने लाना और उन्हें जागरूक करना था। महात्मा गांधी ने भी तिलक की पत्रकारिता की बहुत सराहना की और कहा कि तिलक ने स्वराज को जनता का जन्मसिद्ध अधिकार बताया तथा स्वदेशी को उसका कर्तव्य।
समाज के निचले तबकों और आम जनता के लिए भी तिलक की पत्रकारिता का बड़ा प्रभाव था। वे जनता के बीच लोकप्रिय थे और उनकी लेखनी ने स्वतंत्रता आंदोलन की गहराई और व्यापकता को बढ़ाया।
बाल गंगाधर तिलक की पत्रकारिता ने भारतीय राष्ट्रीयता की भावना को तेज किया, अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट और संगठित जनता का निर्माण किया और स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। यह उनकी विचारधारा का प्रचार करने का सशक्त माध्यम था, जिसने पूरे देश के लोगों में स्वराज की लालसा और जागृति को जन्म दिया.
केसरी और मराठा
- 1881 में उन्होंने ‘केसरी’ (मराठी भाषा में) और ‘द मराठा’ (अंग्रेज़ी भाषा में) नामक दो पत्रिकाओं की शुरुआत की।
- ‘केसरी’ आम जनता को ज्ञान और स्वराज्य की भावना से जागृत करने का प्रमुख माध्यम बना।
इन पत्रों के माध्यम से तिलक ने अंग्रेज सरकार की नीतियों की आलोचना की, भारतीयों से स्वदेशी अपनाने की अपील की और जनता को राजनीतिक रूप से सक्रिय होने के लिए प्रेरित किया।
सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन
तिलक ने यह समझ लिया था कि सिर्फ राजनीतिक आंदोलन करने से जनता तैयार नहीं होगी। इसके लिए लोगों को एकजुट करने की आवश्यकता थी। इसलिए उन्होंने सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजनों को राष्ट्रीय आंदोलन के साधन के रूप में प्रयोग किया।
बाल गंगाधर तिलक ने सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलनों के माध्यम से भारतीय जनता में राष्ट्रीय चेतना और एकता को बढ़ावा दिया। उन्होंने यह समझा कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी संभव है जब समाज में जागरूकता, समरसता और सांस्कृतिक गर्व हो।
गणेशोत्सव का सार्वजनिकरण
तिलक ने पारंपरिक रूप से घरों में मनाए जाने वाले गणेशोत्सव को एक सार्वजनिक, भव्य और व्यापक आयोजन में बदल दिया। यह समारोह समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने वाला मंच बना, जहां जाति, वर्ग और पंथ की सीमाएं धुंधली हो गईं। इस उत्सव ने भारतीय संस्कृति, धार्मिकता और राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया।
शिवाजी उत्सव
उन्होंने छत्रपति शिवाजी के जन्मदिन को राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मनाने की शुरुआत की, जिससे मराठा गौरव और सामूहिक आत्मसम्मान की भावना को जगाया गया। शिवाजी महोत्सव ने एक वीरता और स्वाभिमान का संदेश दिया, जो लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित करता था।
सामाजिक सुधार
तिलक ने सामाजिक असमानताओं, जातिगत भेदभाव और धार्मिक कट्टरता के खिलाफ आवाज उठाई। वे शिक्षा को सामाजिक सुधार का एक प्रमुख माध्यम मानते थे। उन्होंने महिला शिक्षा और बाल विवाह जैसे सामाजिक मुद्दों को लेकर भी काम किया, हालांकि वे कुछ मामलों में रूढ़िवादी विचारों के भी समर्थक थे।
होम रूल आंदोलन
1916 में तिलक ने अन्नी बेसेंट के साथ मिलकर अखिल भारतीय होम रूल लीग की स्थापना की। इस आंदोलन का उद्देश्य भारत में स्वशासन की मांग को मजबूत करना और जनता को राजनीतिक रूप से सक्रिय करना था। इस आंदोलन ने राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा दिया और स्वतंत्रता संग्राम को एक नई गति दी।
हिंदू-मुस्लिम एकता
तिलक ने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए भी प्रयास किए। उन्होंने लखनऊ पैक्ट के माध्यम से दोनों समुदायों की सहमति और सहयोग को बढ़ावा दिया, जो भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सामंजस्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। बाल गंगाधर तिलक का सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक गर्व, सामाजिक सुधार और राजनीतिक जागरूकता के संतुलित मिश्रण पर आधारित था। उनके ये प्रयास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जनता को संगठित और प्रेरित करने का महत्वपूर्ण आधार बने.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और तिलक की भूमिका
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई थी। प्रारंभिक वर्षों में कांग्रेस के नेताओं की विचारधारा “मध्यममार्गी” या उदारवादी थी। वे अंग्रेजी शासन से सुधार की अपेक्षा करते थे।
बाल गंगाधर तिलक ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। 1890 में वे कांग्रेस में शामिल हुए और जल्दी ही कांग्रेस के नरमपंथी रुख के विरोधी एक प्रसिद्ध नेता के रूप में उभरे। वे “गरम दल” (चरमपंथी दल) के मुखिया थे, जो स्वराज्य (स्वशासन) की मांग करते थे और ब्रिटिश शासन के खिलाफ आक्रामक संघर्ष में विश्वास रखते थे।
तिलक ने लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल के साथ मिलकर “लाल-बाल-पाल” की त्रयी बनाई, जिसने स्वराज्य के लिए कठोर और निर्णायक कदम उठाने की बात कही। उन्होंने स्वदेशी और बहिष्कार के आंदोलन चलाए, जिससे अंग्रेजी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी वस्त्रों की प्रोत्साहना हुई।
1907 में कांग्रेस का विभाजन हुआ, जिसमें तिलक के नेतृत्व वाले गरम दल और नरम दल के बीच मतभेद हुए। लेकिन 1916 में लखनऊ अधिवेशन में तिलक ने एनी बेसेंट और मुहम्मद अली जिन्ना के साथ मिलकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य समझौता कराकर एकता की दिशा में कदम बढ़ाया। उसी साल उन्होंने अखिल भारतीय होम रूल लीग की स्थापना की, जिससे भारत में स्वशासन की मांग को व्यापक जन समर्थन मिला।
तिलक ने कांग्रेस के भीतर स्वराज्य की मांग को लोकप्रिय किया और आम जनता को राजनीतिक रूप से सक्रिय किया। उन्होंने राजनीतिक विचारधारा को जनसाधारण तक पहुंचाने का काम किया और स्वतंत्रता आंदोलन को जन-आंदोलन में बदलने की नींव रखी।
बाल गंगाधर तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में स्वराज्य के मजबूत प्रवक्ता, गरम दल के नेता और राष्ट्रीय आंदोलन के अग्रणी नायक थे, जिन्होंने कांग्रेस को जनतंत्रीय आंदोलन में परिवर्तित किया और आज़ादी की राह प्रशस्त की.
नरम दल और गरम दल
- कांग्रेस में गाँधी जी के आने से पहले दो धड़े थे:
- नरम दल – गोपाल कृष्ण गोखले जैसे नेता
- गरम दल – बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चन्द्र पाल (लाल-बाल-पाल त्रयी)
- गरम दल मानता था कि अंग्रेजों से सुधार की आशा व्यर्थ है।
- तिलक कहते थे, “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।”
गरम दल – बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चन्द्र पाल (लाल-बाल-पाल )
गरम दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का एक उग्रवादी गुट था, जिसका नेतृत्व बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल करते थे। इस तिकड़ी को आमतौर पर “लाल-बाल-पाल” के नाम से जाना जाता है। गरम दल का गठन 1907 में हुआ जब कांग्रेस के अंदर मतभेदों के कारण यह संगठन दो भागों में विभाजित हो गई — गरम दल और नरम दल।
गरम दल ब्रिटिश शासन के खिलाफ कठोर और सशक्त संघर्ष की नीति का समर्थक था। उनका मानना था कि भारत को स्वतंत्रता पाने के लिए बिना संघर्ष और बलिदान के कोई रास्ता नहीं है। वे स्वराज्य (स्वशासन) को भारतीयों का जन्मसिद्ध अधिकार मानते थे और इसे पाने के लिए जनता को संगठित और जागरूक करने की पुरजोर वकालत करते थे।
गरम दल ने स्वदेशी आंदोलन का व्यापक प्रचार किया और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को-national आंदोलन का मुख्य हिस्सा बनाया। वे वन्देमातरम को राष्ट्रगीत के रूप में प्रचारित करते थे, जो उस समय ब्रिटिश सरकार के लिए खतरे का संकेत था, जबकि नरम दल “जन गण मन” के समर्थक थे।
सूरत कांग्रेस अधिवेशन (1907) में गरम दल और नरम दल के बीच मतभेद बढ़ गए, जिसके फलस्वरूप कांग्रेस दो भागों में विभाजित हो गई। हालांकि बाद में 1916 के लखनऊ अधिवेशन में दोनों दलों ने एकजुटता का संकल्प लिया।
गरम दल की विचारधारा और नेतृत्व ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी ऊर्जा भर दी और देश के युवा वर्ग में स्वतंत्रता के प्रति भारी उत्साह उत्पन्न किया। लाल-बाल-पाल की तिकड़ी भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के सबसे प्रभावशाली और साहसी नेता मानी जाती है।
गरम दल ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में स्वराज की मांग को सबसे कठोर और स्पष्ट रूप में रखा, और बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम को नई गति दी.
लाल-बाल-पाल
- लाला लाजपत राय (पंजाब)
- बाल गंगाधर तिलक (महाराष्ट्र)
- बिपिन चंद्र पाल (बंगाल)
तीनों नेताओं ने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ उग्र राष्ट्रवाद की नींव रखी।
1905 का बंग-भंग आंदोलन
जब लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल का विभाजन किया तो देशव्यापी आंदोलन हुआ।
- इसमें स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन की नींव पड़ी।
- तिलक ने स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को अपना हथियार बनाया।
- उन्होंने विदेशी कपड़ों की होली जलाकर जनता को जागृत किया।
जेल जीवन और गीता रहस्य
बाल गंगाधर तिलक को 3 जुलाई 1908 को अंग्रेजों ने देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया और उन्हें 6 साल की सजा सुनाकर बर्मा (म्यांमार) के मांडले जेल में रखा गया। यह एक कठोर जेल था, जहां का मौसम अत्यंत अप्रिय और जेल की स्थिति असहनीय थी। जेल में रहते हुए भी तिलक ने अपने मनोबल और साहस को नहीं खोया बल्कि इस अवधि का रचनात्मक उपयोग किया।
मांडले जेल में तिलक ने 400 पन्नों की पुस्तक “गीता रहस्य” लिखी, जिसमें उन्होंने भगवद्गीता के कर्मयोग पर विस्तार से विचार किया। इस ग्रंथ में तिलक ने कर्मयोग की व्याख्या करते हुए यह बताया कि व्यक्ति को अपने धर्म और कर्तव्य का पालन बिना किसी फल की इच्छा के करना चाहिए। उन्होंने मौजूदा टीकाओं के विपरीत भगवद् गीता के रहस्य को स्पष्ट किया और कर्म आधारित जीवनशैली की महत्ता पर जोर दिया।
गीता रहस्य प्राप्ति के अतिरिक्त तिलक ने जेल में अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का भी खूब ध्यान रखा। जेल जीवन की कठिनाइयों के बावजूद वे अपने आदर्शों के प्रति सच्चे और अडिग रहे। महात्मा गांधी ने इस ग्रंथ की बहुत प्रशंसा की और कहा कि यह उनका शाश्वत स्मारक है।
जेल जीवन तिलक के लिए एक स्वाध्याय और चिंतन का काल था, जिसने उनके विचारों को और गहराई दी और स्वतंत्रता संग्राम में उनका नेतृत्व और भी मजबूत किया। यह काल उनके संघर्ष की प्रेरणा और उनकी राजनीतिक विचारधारा की मजबूती का परिचायक था।
संक्षेप में, बाल गंगाधर तिलक का जेल जीवन उनके साहस, लगन और चिंतनशील व्यक्तित्व का प्रतीक था, जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को गहरा प्रभाव दिया और उन्होंने जेल में रहते हुए “गीता रहस्य” जैसी अमूल्य कृति की रचना की.
लोकमान्य की उपाधि
बाल गंगाधर तिलक को “लोकमान्य” की उपाधि भारत के राष्ट्र और जनता ने उन्हें उनके अद्भुत कार्यों और लोकप्रिय नेतृत्व के कारण प्रदान की। “लोकमान्य” का अर्थ है “लोगों द्वारा स्वीकार किया गया” या “जनप्रिय नेता”। यह उपाधि तिलक को उनके देशभक्ति के अदम्य साहस, निर्भीक लेखनी, और जन-चेतना जगाने वाले कार्यों के लिए मिली।
यह उपाधि विशेष रूप से तिलक के नेतृत्व में 1897 में पुणे के एक ब्रिटिश अधिकारी रैंड की हत्या के आरोपी युवकों के पक्ष में उनके साहसिक और प्रभावशाली बचाव के बाद लोकप्रिय हुई। इस घटना के बाद तिलक ने जनता के बीच एक अत्यंत सम्मानित और प्रिय नेता के रूप में अपनी जगह बना ली।
इसके अलावा, तिलक ने महाराष्ट्र और पूरे भारत में स्वराज की मांग को गूंजाया, महाराष्ट्र में कर चोरी (कर न देने) का आंदोलन चलाया, स्वदेशी और बहिष्कार जैसे आंदोलनों को आगे बढ़ाया। उनके नारे “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा” ने पूरे देश में गूंज पैदा की।
होम रूल आंदोलन के दौरान उनका प्रभाव चरम पर था और इसी अवधि में उन्हें “लोकमान्य” कहा जाने लगा। यह उनकी लोकप्रियता, जन-समर्थन और नेतृत्व क्षमता का प्रतीक था।
संक्षेप में, “लोकमान्य” उपाधि बाल गंगाधर तिलक को उनकी देशभक्ति, जनसेवा, और जन-नेतृत्व के लिए मिली जो उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान प्रदर्शित की थी। यह उपाधि उनके व्यक्तित्व और उनके योगदान का सम्मान है.
तिलक को भारतीय जनता ने “लोकमान्य” की उपाधि दी। इसका अर्थ है – जिसे लोग स्वीकार करें, जिसे जनता अपना माने। वे वास्तव में जनता के नायक बन चुके थे।
गाँधी युग से पहले का नेतृत्व
महात्मा गांधी से पहले यदि कोई नेता भारतीय राजनीति की मुख्य धारा को जन-जन तक ले गया तो वे तिलक ही थे।
- उन्होंने पश्चिमी शिक्षित वर्ग और ग्रामीण समाज के बीच की खाई को पाटा।
- उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन को सिर्फ अंग्रेजी पढ़े-लिखे उच्चवर्ग तक सीमित न रखकर किसानों, मजदूरों और सामान्य जनता तक पहुँचाय
गोपाल कृष्ण गोखले से मतभेद
- गोखले नरम नीति के पक्षधर थे।
- तिलक मानते थे कि विदेशी शासन से केवल संघर्ष करके ही आज़ादी प्राप्त की जा सकती है।
तिलक का रुख
- तिलक उग्र राष्ट्रवादी थे, जो स्वराज्य (स्व-शासन) के प्रबल समर्थक थे और उनका नारा था, “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।”
- वे ब्रिटिश शासन के खिलाफ सीधे संघर्ष और जनता में जागरूकता फैलाने के पक्षधर थे।
- उनका मानना था कि अंग्रेजों से स्वतंत्रता पाने के लिए कठोर संघर्ष आवश्यक है।
- तिलक स्वदेशी, बहिष्कार और सांस्कृतिक जागरण के माध्यम से जनता को संगठित करना चाहते थे।
गोपाल कृष्ण गोखले का रुख
- गोखले उदारवादी नेता थे, जो सुधारवादी दृष्टिकोण के पक्षधर थे।
- वे ब्रिटिश सरकार से संवाद और समझौते के द्वारा सुधार पाने की बात करते थे।
- गोखले ने भारतीय जनता को शिक्षा और सुधार के माध्यम से तैयार करने पर जोर दिया।
- वे स्वतंत्रता के लिए तत्काल संघर्ष की बजाय राजनीतिक और सामाजिक सुधारों पर केंद्रित थे।
- महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु भी थे।
प्रमुख मतभेद
- तिलक की नीति ज्यादा आक्रामक और क्रांतिकारी थी, जबकि गोखले का दृष्टिकोण अधिक संयमित और सहयोगात्मक था।
- गोखले ने बाल विवाह जैसे सामाजिक सुधारों का समर्थन किया, जबकि तिलक को इससे कुछ विरोध था।
- तिलक ने राष्ट्रीय भावना और जनता की सक्रिय भागीदारी पर जोर दिया, वहीं गोखले राजनीतिक प्रक्रिया और प्रणाली सुधार में विश्वास रखते थे।
यह मतभेद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के भीतर दो विभिन्न विचारधाराओं — उग्र राष्ट्रवाद और औद्योगिक सुधारवाद — के बीच की लड़ाई का प्रतिनिधित्व करता है, जो बाद में गांधीजी के नेतृत्व में मिलकर एक साझा आंदोलन में परिवर्तित हो गया।
तिलक और गोखले के विचार और कार्य पथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दो महत्वपूर्ण स्तंभ थे, जिनका सामूहिक प्रभाव देश की मुक्ति के लिए निर्णायक साबित हुआ.
होमरूल आंदोलन
1916 में अन्नी बेसेंट और तिलक ने मिलकर होमरूल आंदोलन शुरू किया।
- इसका लक्ष्य भारत को स्वशासन हेतु तैयार करना था।
- इस आंदोलन से देश में स्वतंत्रता की माँग तेज हुई।
होमरूल आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण आंदोलन था, जिसकी शुरुआत 1916 में हुई। इसका उद्देश्य भारत के लिए स्वशासन या स्वराज्य की मांग करना था। यह आंदोलन ब्रिटिश शासन के अधीन भारत को एक स्वशासित उपनिवेश बनाने की मांग करता था, जिससे भारतीय जनता को अपने प्रशासन और राजनीति में अधिकार मिल सकें।
होमरूल आंदोलन की शुरुआत मुख्य रूप से दो स्थानों पर हुई — पुणे में बाल गंगाधर तिलक द्वारा और मद्रास में एनी बेसेंट द्वारा। दोनों नेताओं ने मिलकर अखिल भारतीय होमरूल लीग की स्थापना की। इस आंदोलन का लक्ष्य था भारत में एक राष्ट्रीय संसद की स्थापना, जिसमें भारतीयों को शासन के अधिकार मिलें।
इस आंदोलन से भारतीय राजनीति में जागरूकता और सक्रियता बढ़ी। यह आंदोलन उग्रवादी एवं उदारवादी विचारधाराओं के बीच एक सेतु का काम करता था। एनी बेसेंट और तिलक ने शांतिपूर्ण, वैधानिक और संविधानिक तरीकों से आंदोलन को चलाने पर जोर दिया ताकि क्रांतिकारियों और आतंकवादियों के प्रभाव को रोका जा सके। तिलक ने कहा था, “होमरूल मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, मैं इसे लेकर रहूँगा।”
होमरूल आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को भारतीय मांगों की गंभीरता का अहसास कराया और स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। हालांकि यह आंदोलन 1918 तक कुछ कमजोर पड़ गया, लेकिन इसने भारी संख्या में नए आंदोलनकारियों को प्रेरित किया और गांधी जी के अहिंसात्मक असहयोग आंदोलन के लिए जमीन तैयार की।
संक्षेप में, होमरूल आंदोलन ने भारत को स्वशासन की ओर पहला संगठित कदम बढ़ाया, भारतीय जनता को राजनीतिक रूप से जागृत किया और स्वतंत्रता संग्राम की गति को तेज किया। इस आंदोलन ने भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में एक क्रांतिकारी बदलाव लाया.
अंतरराष्ट्रीय महत्त्व
तिलक के विचार और संघर्ष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चित हुए।
- भारतीय स्वतंत्रता का समर्थन लंदन, पेरिस और अमेरिका के अखबारों में छपता था।
- मांडले जेल से निकलने के बाद वे इंग्लैंड भी गए और वहाँ भारतीय स्वतंत्रता की मांग रखी।
व्यक्तिगत जीवन और संघर्ष
- तिलक का घरेलू जीवन साधारण था।
- वे सादगी, सच्चाई और परिश्रम के प्रतीक थे।
- पारिवारिक कठिनाइयों और आर्थिक संकटों के बावजूद उन्होंने राष्ट्रसेवा को सर्वोपरि रखा।
तिलक का निधन

1 अगस्त 1920 को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया। उस समय पूरा राष्ट्र शोकाकुल हो उठा। उनकी अंतिम यात्रा में लाखों लोग शामिल हुए।
महात्मा गांधी ने कहा –
“यदि लोकमान्य तिलक दो साल और जीवित रहते तो शायद हमें स्वतंत्रता और जल्दी मिल जाती।”
बाल गंगाधर तिलक का निधन 1 अगस्त 1920 को मुंबई में हुआ था। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख नेता, उग्र राष्ट्रवादी, शिक्षक, समाज सुधारक और पत्रकार थे। तिलक ने अपने जीवन में स्वराज्य का नारा दिया और इसे प्राप्त करने के लिए सशक्त संघर्ष किया।
उनका मशहूर नारा था, “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।”
उनका निधन उस दिन हुआ जब असहयोग आंदोलन की शुरुआत हो रही थी। महात्मा गांधी ने तिलक की मृत्यु के बाद उन्हें “आधुनिक भारत का निर्माता” कहा, जबकि जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें भारतीय क्रांति का जनक बताया। तिलक का जीवन संघर्ष, त्याग और देशभक्ति का प्रतीक माना जाता है।
उनकी मृत्यु के बाद भी उनका प्रभाव और विचार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गहराई से जीवित रहे। तिलक की शिक्षाएं और उनके द्वारा शुरू किए गए आंदोलनों ने भारत को आज़ाद करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बाल गंगाधर तिलक का निधन 1 अगस्त 1920 को हुआ, पर उनकी विरासत और विचार आज भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रेरणा स्रोत हैं.
विचारधारा और योगदान का मूल्यांकन
- राजनीति में योगदान – स्वराज्य का नारा दिया और जनसाधारण को राजनीतिक संघर्ष के लिए प्रेरित किया।
- सामाजिक योगदान – गणेशोत्सव और शिवाजी महोत्सव के जरिये लोकजागरण किया।
- शैक्षिक योगदान – डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी और फर्ग्यूसन कॉलेज की स्थापना की।
- साहित्यिक योगदान – पत्रकारिता और गीता रहस्य जैसे ग्रंथों से भारतीय संस्कृति को बल दिया।
- आर्थिक योगदान – स्वदेशी आंदोलन के समर्थक बने।
बाल गंगाधर तिलक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख शिल्पकारों में से थे। उनका जीवन संघर्ष, त्याग और देशभक्ति का आदर्श है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि एक व्यक्ति भी जनमानस में राष्ट्रीय चेतना जगा सकता है।
उनकी वाणी, लेखनी और कार्य आज भी प्रेरणास्त्रोत हैं। उन्होंने हमें यह सिखाया कि स्वतंत्रता कोई दान नहीं, बल्कि संघर्ष से अर्जित अधिकार है।
लोकमान्य तिलक सदैव भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के “अग्रदूत” के रूप में याद किए जाएँगे।

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