लाल बहादुर शास्त्री: हिंदी में विस्तृत जीवनी और उनके योगदान

लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने 9 जून 1964 से लेकर अपनी मृत्यु तक 11 जनवरी 1966 तक लगभग अठारह महीने देश की सेवा की। उनका जीवन संघर्ष, सादगी, देशभक्ति और नेतृत्व की मिसाल रहा है। शास्त्री जी ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेकर देश की स्वतंत्रता के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और स्वतंत्रता के बाद भी अनेक पदों पर असाधारण सेवा की। उनका सबसे प्रमुख योगदान 1965 के भारत-पाक युद्ध में था, जिसमें उन्होंने अपनी सूझ-बूझ और नेतृत्व से देश को विजय दिलाई।
प्रारंभिक जीवन
- लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को मुगलसराय (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में हुआ था।
- उनके पिता शारदाप्रसाद श्रीवास्तव एक क्लर्क थे
- माता रामदुलारी देवी थीं।
- उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा हरीश चंद्र हाई स्कूल से प्राप्त की, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम के कारण अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी।
- उनका विवाह ललिता देवी से 1928 में हुआ था।
- उन्होंने काशी विद्यापीठ से ‘शास्त्री’ की उपाधि प्राप्त की।
स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका
शास्त्री जी ने कम उम्र में ही महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया और अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई। उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा, जिसमें कुल नौ साल से अधिक समय वे कैद रहे। उन्होंने नमक सत्याग्रह एवं भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। जेल के दिनों में उन्होंने विभिन्न दर्शनशास्त्रों और क्रांतिकारियों के कार्यों का अध्ययन किया, जो उनके व्यक्तित्व का विकास करने में सहायक साबित हुआ।
- लाल बहादुर शास्त्री की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और समर्पित रही। उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले कई आंदोलनों में हिस्सा लिया,
- 1921 का असहयोग आंदोलन,
- 1930 का दांडी मार्च (नमक सत्याग्रह), और
- 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन।
- शास्त्री जी ने भारत की आज़ादी के लिए कई बार जेल भी गए, जहां उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के विचारों और दर्शन का गहरा अध्ययन किया।
विशेष रूप से 9 अगस्त 1942 को, उन्होंने इलाहाबाद में अगस्त क्रांति की ‘दावानल’ को पूरे देश में तेज़ किया, जिसके तहत उन्होंने 11 दिनों तक भूमिगत रहकर आंदोलन का नेतृत्व किया। 19 अगस्त 1942 को उन्हें गिरफ्तार कर जेल जाना पड़ा। उनकी इसी प्रतिबद्धता और सक्रियता ने स्वतंत्रता संग्राम को मजबूती दी।
शास्त्री जी के राजनीतिक मार्गदर्शक महात्मा गांधी के साथ-साथ पुरुषोत्तमदास टंडन, पंडित गोविंद बल्लभ पंत और जवाहरलाल नेहरू थे। उनकी राजनैतिक यात्रा की शुरुआत भारत सेवक संघ से हुई, जहाँ उन्होंने देशसेवा का संकल्प लिया। स्वतंत्रता पश्चात् उन्होंने उत्तर प्रदेश में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया और अंततः भारत के प्रधानमंत्री बने।
उनका स्वतंत्रता संग्राम में योगदान उनकी सादगी, कड़ी मेहनत और देशभक्ति का प्रतीक है, जिसने उन्हें न केवल एक महान नेता बनाया बल्कि उस युग के कठिन दौर में भारत को सही दिशा देने वाला एक सक्षम नेतृत्व भी प्रदान किया।
राजनीतिक जीवन और ministerial पद
स्वतंत्रता के बाद, शास्त्री जी ने उत्तर प्रदेश में संसदीय सचिव और बाद में मंत्री के रूप में काम किया। वह गोविंद बल्लभ पंत के मंत्रीमंडल में पुलिस और परिवहन मंत्री रहे। रेल मंत्रालय संभालते हुए उन्होंने यात्री सुविधाओं में सुधार किया तथा पहली बार महिला कंडक्टर्स की नियुक्ति की। 1951 में कांग्रेस के महासचिव बने और 1952 से लेकर 1962 तक विभिन्न चुनावों में पार्टी का नेतृत्व किया। वे अपने उच्च नैतिक मूल्यों और संगठनी क्षमता के लिए पहचाने जाते थे।
स्वतंत्रता के बाद, लाल बहादुर शास्त्री ने उत्तर प्रदेश में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। उन्हें उत्तर प्रदेश का संसदीय सचिव नियुक्त किया गया और बाद में गोविंद बल्लभ पंत के मंत्रिमंडल में पुलिस और परिवहन मंत्री के रूप में कार्य किया। परिवहन मंत्री के रूप में उन्होंने पहली बार महिला कंडक्टर्स की नियुक्ति की और पुलिस मंत्री रहते हुए उन्होंने भीड़ नियंत्रण के लिए लाठी की जगह पानी की बौछार कराने का तरीका अपनाया।
1951 में वह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव बने। इसके बाद 1952, 1957 और 1962 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत से जिताने में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। बाद में उन्होंने कई केंद्रीय मंत्रालयों का प्रभार संभाला जिसमें रेल मंत्रालय भी शामिल था। रेल मंत्री के रूप में एक रेल दुर्घटना को लेकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया, जो उनके नैतिक चरित्र का प्रमाण था।
शास्त्री जी ने गृह मंत्री, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री और रेल मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी काम किया। उनके नेतृत्व और ईमानदारी के कारण, जब जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद 1964 में प्रधानमंत्री पद खाली हुआ तो उन्हें सर्वसम्मति से भारत के दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में किया गया।
प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद उन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध में देश का सफल नेतृत्व किया और ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा देकर सैनिकों और किसानों का मनोबल बढ़ाया। उनका राजनीतिक जीवन ईमानदारी, समर्पण और कड़ी मेहनत का प्रतीक था, जिसने उन्हें देश के एक महान नेता के रूप में स्थापित किया।
प्रधानमंत्री बनना और कार्यकाल

1964 में जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद, शास्त्री जी को सर्वसम्मत रूप से भारत का दूसरा प्रधानमंत्री चुना गया। उन्होंने देश को कई गंभीर समस्याओं से उबारने का काम किया। उनके कार्यकाल में भारत खाद्य संकट का सामना कर रहा था, साथ ही चीन के कठिन हालात थे। उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया, जो देश में सैनिकों और किसानों के मनोबल को बढ़ाने वाला सिद्ध हुआ।
लाल बहादुर शास्त्री 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 तक भारत के दूसरे प्रधानमंत्री रहे। उनका प्रधानमंत्री पद संभालना जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद हुआ। उन्हें कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने सर्वसम्मति से इस पद के लिए चुना। उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल का समय देश के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि उस समय भारत कई आंतरिक और बाहरी संकटों से जूझ रहा था।
उनके कार्यकाल की शुरुआत में देश खाद्य संकट से जूझ रहा था। शास्त्री जी ने खाद्यान्न मूल्य नियंत्रण को अपनी शीर्ष प्राथमिकता बनाया और इसमें सफलता भी हासिल की। उन्होंने व्यावहारिक और जनता के हितों के अनुरूप निर्णय लिए। उनके नेतृत्व में भारत ने 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध किया, जो भारत के लिए निर्णायक था। इस युद्ध में शास्त्री जी की रणनीति और नेतृत्व ने देश का मनोबल बढ़ाया। उनका प्रसिद्ध नारा ‘जय जवान, जय किसान’ देश के सैनिकों और किसानों दोनों के लिए प्रेरणा स्रोत बना।
1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान, भारत की सेना ने साहस और रणनीति का परिचय दिया। युद्ध के बाद ताशकंद समझौते में शास्त्री जी ने पाकिस्तान के साथ युद्ध विराम की संधि पर हस्ताक्षर किए। हालांकि, उनकी इस वार्ता के कुछ घंटों बाद 11 जनवरी 1966 को उनकी मृत्यु रहस्यमय परिस्थितियों में हुई।
शास्त्री जी ने अपने संक्षिप्त कार्यकाल में देश को स्थिरता और आत्मनिर्भर बनने की राह दी। उनकी ईमानदारी, राष्ट्रभक्ति और सरल जीवन शैली आज भी लोगों के लिए आदर्श हैं। उन्हें मृत्यु के बाद मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
इस प्रकार, लाल बहादुर शास्त्री का प्रधानमंत्री काल भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक अध्याय है।
प्रमुख उपलब्धियाँ
लाल बहादुर शास्त्री की प्रमुख उपलब्धियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक हैं, जिनसे भारत के इतिहास में उनका विशेष स्थान बना। उनकी राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियाँ निम्नलिखित हैं:
- 1965 का भारत-पाक युद्ध में सफल नेतृत्व: शास्त्री जी के नेतृत्व में भारत ने पाकिस्तान के हमलों का साहसिक और प्रभावशाली मुकाबला किया। उन्होंने युद्ध के समय राष्ट्रीय मनोबल बनाए रखा और भारतीय सेना को एकजुट किया। इस युद्ध में भारत की सेना ने पाकिस्तान के आक्रमण को विफल कर दिया और कुछ क्षेत्रों पर कब्जा किया।
- जय जवान, जय किसान का नारा: इस नारे से शास्त्री जी ने सैनिकों और किसानों दोनों का मनोबल बढ़ाया। यह नारा आज भी भारत में राष्ट्रवाद और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।
- हरित क्रांति की नींव: भारत खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था, इसलिए उन्होंने आधुनिक कृषि तकनीकों, उच्च गुणवत्ता वाले बीजों और सिंचाई सुविधाओं के साथ हरित क्रांति की शुरुआत की। इससे कृषि उत्पादन में बड़ी वृद्धि हुई और भारत धान, गेहूं आदि में आत्मनिर्भर बना।
- ताशकंद समझौता: 1965 के युद्ध के बाद शास्त्री जी ने पाकिस्तान के साथ ताशकंद में शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह युद्ध विराम और शांति स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण कदम था।
- श्वेत क्रांति (दूध उत्पादन में वृद्धि): उन्होंने दूध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए ऑपरेशन फ्लड जैसी योजनाओं की नींव रखी। इससे भारत विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बना।
- सामाजिक और आर्थिक सुधार: शास्त्री जी ने गरीबों, शरणार्थियों और कमजोर वर्गों के लिए रोजगार, शिक्षा तथा पुनर्वास योजनाएं शुरू कीं। उन्होंने सामाजिक एकता और आर्थिक विकास के लिए निजी और सरकारी प्रयासों को प्रोत्साहित किया।
- परिवहन और पुलिस सुधार: परिवहन मंत्री रहते हुए उन्होंने महिला कंडक्टर्स की नियुक्ति की। पुलिस मंत्री के रूप में हिंसक भीड़ नियंत्रण के लिए लाठी चार्ज की जगह पानी के जेट का प्रयोग शुरू किया।
- सादगी और नैतिकता का प्रतीक: शास्त्री जी की जीवनशैली सादगी और ईमानदारी की मिसाल रही। उन्होंने भ्रष्टाचार से दूर रहते हुए नेतृत्व किया और जनता की सेवा को सर्वोपरि माना।
- राष्ट्रीय खाद्य संकट का सफल समाधान: जब देश खाद्य संकट से जूझ रहा था तब उन्होंने जनता को उपवास करने की अपील की और खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में सफलता प्राप्त की।
- साम्प्रदायिक दंगों पर नियंत्रण: स्वतंत्रता के बाद जब देश में दंगे हुए, तब उन्होंने पुलिस और प्रशासनिक उपायों से स्थिति को प्रभावशाली ढंग से संभाला।
लाल बहादुर शास्त्री को मरणोपरांत वर्ष 1966 में भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी ये उपलब्धियां भारतीय जनमानस में आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं।
अंतिम दिन और विरासत
शास्त्री जी की मृत्यु 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में रहस्यमय परिस्थितियों में हुई। उनकी सादगी, देशभक्ति और नेतृत्व के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया। उनका जीवन आज भी प्रेरणा का स्रोत है और वे भारतीय इतिहास में एक महान नेता के रूप में याद किए जाते हैं।
लाल बहादुर शास्त्री का निधन 11 जनवरी 1966 की सुबह ताशकंद (तत्कालीन सोवियत संघ) में हुआ। वे उस समय 61 वर्ष के थे। आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार उनकी मृत्यु का कारण मायोकार्डियल इन्फार्क्शन (हार्ट अटैक) था। शास्त्री जी ताशकंद समझौते के तुरंत बाद रहस्यमय परिस्थितियों में इस दुनिया से विदा हो गए, जिससे कई सवाल और जिज्ञासाएं उठीं।
उनकी मृत्यु के बाद कई वर्षों तक इसे लेकर विभिन्न संदर्भ सामने आते रहे। कुछ लोगों ने इसे ‘संदिग्ध’ और ‘रहस्यमय’ बताया क्योंकि शव जब भारत लाया गया तो नीला पड़ चुका था। हालांकि उनके जीवनीकारों ने इस बात की पुष्टि की कि यह शव-लेपन प्रक्रिया का हिस्सा था। शव परीक्षण न किए जाने की वजह से मृत्यु के कारण को लेकर संदेह बना रहा।
शास्त्री जी ने अपने अंतिम समय तक देश की सेवा की और शांति समझौते पर हस्ताक्षर कर एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि हासिल की। उनका अंत भी अपने राजनीतिक जीवन की तरह एक रहस्यमय और भावुक विषय रहा है।
उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ यमुना के किनारे, शान्तिवन (जजहां जवाहरलाल नेहरू की समाधि है) के पास विजय घाट नामक स्थल पर हुआ। उनकी सादगी, देशभक्ति और नैतिकता की विरासत आज भी भारत के लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत है। मरणोपरांत उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया और उनके बाद सरकार का कार्यभार गुलजारीलाल नन्दा ने कुछ समय के लिए संभाला। उनके जीवन और योगदानों को भारतीय इतिहास में अमिट रूप से याद किया जाता है।

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