महात्मा गांधी ( Mahatma Gandhi )

महात्मा गांधी (मोहनदास करमचंद गांधी) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान नेता और ‘राष्ट्रपिता’ थे। महात्मा गांधी का बचपन साधारण था, उन्होंने नैतिकता, सत्य और अहिंसा के मूल्यों को अपनाया।
गांधी जी ने इंग्लैंड में कानून की पढ़ाई की और वकालत करने के लिए दक्षिण अफ्रीका गए, जहां उन्होंने वहां की नस्लीय भेदभाव नीति के खिलाफ संघर्ष शुरू किया। उन्होंने सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांत को अपनाकर भारतीयों के अधिकारों के लिए कई आंदोलनों का नेतृत्व किया।
1915 में भारत लौटने के बाद, उन्होंने चंपारण, खेड़ा, और अन्य आंदोलनों का नेतृत्व किया जो अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता की मांग थे। 1930 में उन्होंने ब्रिटिश नमक कानून के विरुद्ध प्रसिद्ध नमक सत्याग्रह चलाया, जिसे पूरे देश में समर्थन मिला। गांधी जी ने अहिंसा, सत्याग्रह, और आत्मनिर्भरता के सिद्धांतों पर आधारित कई सामाजिक सुधार भी किए।
जीवन परिचय
- उनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर शहर में हुआ था।
- पिता का नाम करमचंद गांधी
- माता का नाम पुतलीबाई
- पत्नी का नाम कस्तूरबा गांधी
महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी के चार पुत्र थे, जिनके नाम हैं:
- हीरालाल गांधी (बड़ा पुत्र)
- मणिलाल गांधी
- रामदास गांधी
- देवदास गांधी
- शिक्षा : गांधीजी ने सात वर्ष की उम्र तक पोरबंदर के प्राथमिक विद्यालय
- बाद में उन्होंने राजकोट के समलादास कॉलेज से मैट्रिक की
- 1888 में कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए
- 30 जनवरी 1948 को गांधीजी की नाथूराम गोडसे द्वारा हत्या कर दी गई
महात्मा गांधी का प्रारंभिक जीवन ( Mahatma Gandhi Early life )
महात्मा गांधी का बचपन पोरबंदर (गुजरात) में हुआ था। उनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 को एक साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता करमचंद गांधी जो पोरबंदर राज्य के दीवान (प्रधान मंत्री) थे, और माता का नाम पुतलीबाई था। महात्मा गांधी का बचपन बहुत ही सामान्य था, जिसमें उन्होंने नैतिकता, सत्य और सदाचार के सिद्धांत सीखे।
उनका बचपन सरल और धार्मिक विचारों से भरा था, जिसमें माता-पिता ने उन्हें सत्य, अहिंसा, और संयम के गुण सिखाए। बचपन से ही वे शाकाहारी थे और विभिन्न जातियों के प्रति सहिष्णुता का भाव रखते थे।
गांधीजी ने सात वर्ष की उम्र तक पोरबंदर के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई की, फिर उनका परिवार राजकोट चला गया जहाँ उन्होंने आगे की पढ़ाई की। 7 साल की उम्र में उनकी कस्तूरबा से सगाई हो गई थी। बाद में उन्होंने राजकोट के समलादास कॉलेज से मैट्रिक की और 1888 में कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए।
गांधीजी ने अपने बचपन में कई भारतीय लोक कथाओं और महापुरुषों की कहानियों से प्रेरणा ली। उनका स्कूल का दाखिला राजकोट में 9 नवंबर 1876 को हुआ था। बचपन में उनकी सगाई 7 साल की उम्र में कस्तूरबा से कर दी गई थी, जो बाद में उनकी पत्नी बनीं।
उनके बचपन के अनुभवों ने उनके व्यक्तित्व और विचारों को गहरा प्रभाव दिया, जो बाद में उनके स्वतंत्रता संग्राम में अहिंसा और सत्याग्रह के रूप में विकसित हुए। पोरबंदर में उनका पैतृक निवास “कीर्ति मंदिर” के नाम से प्रसिद्ध है, जहां उनकी जीवनी और यादगारें देखी जा सकती हैं।
इस प्रकार महात्मा गांधी का प्रारंभिक जीवन संयम, अध्यात्म, और सामाजिक जागरूकता का प्रारूप था, जिसने उन्हें एक आदर्श नेता बनाया
महात्मा गांधी की वकालत की शुरुआत ( Beginning of Mahatma Gandhi’s advocacy )

महात्मा गांधी ने वकालत की शुरुआत भारत में मुंबई में की थी। 1888 में वे इंग्लैंड से बैरिस्टर की डिग्री लेकर भारत लौटे थे। शुरूआत में उन्होंने राजकोट में वकालत करने की योजना बनाई थी, लेकिन कुछ मित्रों के सुझाव पर उन्होंने मुंबई में हाई कोर्ट में अनुभव प्राप्त किया। वे मुंबई के स्मॉल कॉज कोर्ट में अपने पहले मुकदमे के लिए खड़े हुए, जहां वे अनुभवहीन थे और उन्हें शुरुआत में अदालत में खड़े होने में बहुत डर लगा।
उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत सेवा भाव से की और ज्यादातर मामलों में वे बिना फीस के काम करते थे। उनका पहला मुकदमा मुंबई में था, जिसकी फीस उन्होंने 30 रुपये प्राप्त की। हालांकि मुकदमों में वह जल्दी सफल नहीं हो पाए, पर सत्य और ईमानदारी के कारण उनकी प्रसिद्धि बढ़ने लगी।
महात्मा गांधी लगभग 1891 तक भारत में वकालत करते रहे, फिर 1893 में वे दक्षिण अफ्रीका चले गए जहां उन्होंने भारतीय समुदाय के अधिकारों के लिए सत्याग्रह और अहिंसात्मक आंदोलन की शुरुआत की।
सारांश में, गांधी जी ने भारत में लगभग 1891 तक वकालत की और फिर दक्षिण अफ्रीका में अपने सशक्त राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष की शुरुआत की।
दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी को वकालत के दौरान अनुभव
दक्षिण अफ्रीका जाने से पहले महात्मा गांधी को वकालत के दौरान कई कठिन अनुभव हुए थे। 1888 में इंग्लैंड से बैरिस्टर की डिग्री प्राप्त कर वे भारत लौटे। मुंबई और राजकोट में वकालत की शुरुआत की, लेकिन यहां उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली। मुंबई में पहला मुकदमा लड़ते समय वे घबराए, क्योंकि गवाहों से पूछताछ करना और अदालत में बहस करना उनके लिए नया और चुनौतीपूर्ण था। राजकोट में देशी वकीलों के मुकाबले बैरिस्टर की महंगी फीस और अनुभव के अभाव के कारण वे वकालत में सफल नहीं हो पाए।
1893 तक वित्तीय संकट बढ़ गया था और वे अपनी वकालत में असफल थे। इसी दौरान उन्हें दक्षिण अफ्रीका के एक गुजराती व्यापारी का कानूनी मामले में सहयोग करने का मौका मिला, जिसके लिए वे दक्षिण अफ्रीका गए। वहां गांधी ने देखा कि भारतीयों के साथ रंगभेद और अपमान होता है। इन्हीं अनुभवों ने उनका आत्मबल बढ़ाया और उन्होंने भारतीयों के अधिकारों की लड़ाई शुरू की।
महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में 1893 से 1914 तक लगभग 21 वर्षों तक आंदोलन किया। उनके आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य वहां रहने वाले भारतीयों के खिलाफ हो रहे रंगभेद और अन्याय के खिलाफ लड़ना था। उन्होंने सत्याग्रह (अहिंसात्मक प्रतिरोध) का सिद्धांत यहीं विकसित किया।
महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका में मुख्य आंदोलन और कार्य:
- 1894 में उन्होंने नैटल इंडियन कांग्रेस (Natal Indian Congress) की स्थापना की, जो भारतीयों के अधिकारों के लिए एक राजनीतिक मंच था।
- 1903 में उन्होंने ‘इंडियन ओपिनियन’ नामक अखबार शुरू किया, जिससे भारतीयों की समस्याओं को उजागर किया गया।
- 1906 में ट्रांसवाल एशियाटिक ऑर्डिनेंस के खिलाफ पहला सत्याग्रह शुरू किया, जो भारतीयों पर कई कड़े कानून लगाता था।
- 1899-1902 के बोर युद्ध के दौरान, उन्होंने भारतीय एम्बुलेंस कोर की स्थापना की, ब्रिटिश सेना की सहायता के लिए।
- 1904 में डरबन के पास फीनिक्स सेटलमेंट की स्थापना की, जहां समुदाय आधारित जीवन और अहिंसा के सिद्धांतों को बढ़ावा दिया गया।
- कई बार गिरफ्तारी और जेल भी गई, लेकिन आंदोलन जारी रखा।
- ब्रिटिश सरकार के साथ कई बातचीत और समझौते किए।
- 1914 में भारतीय राहत अधिनियम (Indian Relief Act) लागू हुआ, जिसने कुछ भेदभावपूर्ण कानूनों को कम किया।
दक्षिण अफ्रीका में उनका सत्याग्रह आंदोलन भारत के स्वतंत्रता संग्राम की नींव बना और विश्व के अन्य नागरिक अधिकार आंदोलनों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा। यह संघर्ष महात्मा गांधी के सामाजिक और राजनीतिक जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।
महात्मा गांधी के भारत में सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन

महात्मा गांधी ने भारत में कई सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों का नेतृत्व किया, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण चरण रहे। उनके प्रमुख आंदोलन इस प्रकार हैं:
- चंपारण सत्याग्रह (1917): यह गांधी जी का पहला सफल आंदोलन था, जिसमें उन्होंने बिहार के चंपारण के किसानों के अधिकारों की रक्षा की। वहां के किसानों पर नील की खेती के कारण अत्याचार हो रहा था।
- खेड़ा सत्याग्रह (1918): गुजरात के खेड़ा क्षेत्र में किसानों के भारी कर भार और अकाल के विरोध में यह आंदोलन चलाया गया। उन्होंने किसानों को संगठित किया और ब्रिटिश सरकार के अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई।
- खिलाफत आंदोलन (1919) – मुसलमानों के धार्मिक नेता की रक्षा के लिए शुरू किया गया आंदोलन, जिसमें गांधीजी ने भी समर्थन दिया।
- असहयोग आंदोलन (1920-22): ब्रिटिश सामानों के बहिष्कार, सरकारी सेवाओं से इस्तीफा, और विद्यालयों का बहिष्कार जैसे अहिंसात्मक विरोध के रूप में यह आंदोलन हुआ। यह आंदोलन ब्रिटिश सरकार के खिलाफ व्यापक जन समर्थन लेकर आया।
- नमक सत्याग्रह (दांडी मार्च) (1930): ब्रिटिश लवण कानून के खिलाफ गांधी जी ने साबरमती आश्रम से दांडी तक 24 दिन का पदयात्रा किया और खुद समुद्र से नमक बनाया। इस आंदोलन ने पूरी देश में ब्रिटिश कानून का विरोध फैलाया।
- दलित आंदोलन (1933) – अस्पृश्यता और छुआछूत के खिलाफ आंदोलन।
- भारत छोड़ो आंदोलन (1942): दूसरा विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों से आज़ादी की अंतिम मांग के रूप में शुरू किया गया यह आंदोलन भारत की आज़ादी के लिए निर्णायक मोड़ था।
- सामाजिक सुधार आंदोलन: गांधी ने अस्पृश्यता के खिलाफ अभियान चलाया, दलितों को “हरिजन” कहा और समानता का संदेश दिया। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों, शराब बंदी, शिक्षा और गरीबी उन्मूलन पर भी कार्य किया।
गांधीजी के ये आंदोलन ना केवल स्वतंत्रता की लड़ाई में निर्णायक थे, बल्कि उन्होंने भारत के सामाजिक ताने-बाने में भी सुधार किया। उनकी अहिंसा, सत्याग्रह और स्वराज के विचार आज भी विश्वभर में प्रेरणा का स्रोत हैं।
दांडी मार्च ने ब्रिटिश नीतियों पर इस तरह दबाव बनाया:
- ब्रिटिश नमक एकाधिकार पर सीधी चुनौती: गांधी जी ने साबरमती आश्रम से दांडी तक 241 मील की यात्रा कर ब्रिटिश सरकार के नमक उत्पादन और बिक्री पर एकाधिकार को तोड़ा। उन्होंने समुद्र के पानी से स्वयं नमक बनाया, जो ब्रिटिश कानून के तहत अवैध था। इससे ब्रिटिश नमक कानून का प्रतीकात्मक और व्यावहारिक विरोध हुआ।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन को तगड़ा आरंभ: दांडी मार्च ने सविनय अवज्ञा को देशभर में फैलाया, लाखों भारतीयों ने अहिंसा का सहारा लेकर ब्रिटिश कानूनों का उल्लंघन करना शुरू किया, जिससे ब्रिटिश प्रशासन पर भारी दबाव आया।
- ब्रिटिश शासन की नैतिक और राजनीतिक साख को ठेस: इस अहिंसात्मक आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार की विश्वसनीयता और औपनिवेशिक वैधता को प्रभावित किया। विश्व के कई भागों में ब्रिटिश शासन के खिलाफ आलोचना बढ़ी।
- आर्थिक रूप से ब्रिटिश सरकार को नुकसान: आंदोलन के कारण नमक पर कर राजस्व में गिरावट आई। लोगों ने ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार करना शुरू कर दिया, जिससे व्यापार प्रभावित हुआ।
- सामाजिक और राजनीतिक एकजुटता: दांडी मार्च ने विभिन्न समुदायों और वर्गों के लोगों को एकजुट किया। यह आंदोलन राष्ट्रीयता और स्वतंत्रता के लिए महत्त्वपूर्ण था।
- ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया: ब्रिटिश प्रशासन ने व्यापक स्तर पर गिरफ्तारियां शुरू कीं, लेकिन अहिंसात्मक विरोध ने ब्रिटिश शक्ति को कमजोर किया।
इस प्रकार दांडी मार्च ने ब्रिटिश नीतियों और उनके औपनिवेशिक नियंत्रण पर गहरा दबाव डालकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। यह आंदोलन आज भी विश्व में अहिंसक प्रतिरोध का एक अनूठा उदाहरण माना जाता है।
महात्मा गांधी: भारत के राष्ट्रपिता, सत्याग्रह और अहिंसा के मार्गदर्शक
महात्मा गांधी: भारत के राष्ट्रपिता
Mahatma Gandhi spinning yarn on a charkha

महात्मा गांधी, जिनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था, भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेता और आध्यात्मिक मार्गदर्शक थे। उनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर, गुजरात में हुआ था और 30 जनवरी 1948 को दिल्ली में उनकी हत्या कर दी गई थी। गांधीजी ने सत्य, सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांतों के आधार पर विदेशी शासन व अन्याय का विरोध किया, जिससे पूरे विश्व में नागरिक अधिकारों और स्वतंत्रता आंदोलनों को दिशा मिली.
राष्ट्रपिता की उपाधि कैसे मिली?
महात्मा गांधी को ‘भारत के राष्ट्रपिता’ के रूप में सम्मानित किया गया है क्योंकि उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया, अपने जीवन में सत्य, अहिंसा और नैतिकता को अपनाया, और भारतीय समाज को एकजुट किया। गांधीजी ने अहिंसात्मक आंदोलनों के माध्यम से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया, जिसके कारण भारत को स्वतंत्रता मिली। उनके आदर्श और आचरण ने न केवल देशवासियों को बल्कि पूरे विश्व को प्रभावित किया।
‘राष्ट्रपिता’ की उपाधि उन्हें नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 4 जून 1944 को सिंगापुर रेडियो संदेश के माध्यम से दी थी। इसके बाद भारत सरकार और जनता ने उन्हें यही सम्मान दिया. गांधी जी को इससे पहले “बापू” पुकारा जाने लगा था, जिसे सबसे पहले चंपारण सत्याग्रह के दौरान एक किसान ने संबोधित किया था.
गांधीजी की सबसे महत्वपूर्ण विरासत यह है कि उन्होंने सत्याग्रह (अत्याचार के खिलाफ सत्य और अहिंसा के बल पर प्रतिकार) और अहिंसा (non-violence) का मार्ग दिखाया. उन्होंने जनता को विदेशी सामानों का बहिष्कार करने, स्वदेशी वस्त्र (खादी) अपनाने, और सामाजिक बुराइयों जैसे अस्पृश्यता के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया।
उनकी मृत्यु 30 जनवरी 1948 को दिल्ली में हुई, लेकिन उनके सिद्धांत आज भी समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं. गांधी जयंती (2 अक्टूबर) को भारत में राष्ट्रीय पर्व और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
इस प्रकार, महात्मा गांधी भारत के राष्ट्रपिता माने जाते हैं, जिन्होंने पूरी दुनिया को सत्य, अहिंसा और नैतिकता का संदेश दिया.
सत्याग्रह और अहिंसा के प्रेरक
गांधी जी ने सत्याग्रह, यानी सत्य के आग्रह और अहिंसा (non-violence) को अपने समस्त आंदोलनों का आधार बनाया। उनका पहला सत्याग्रह आंदोलन 1917 में बिहार के चंपारण में हुआ। इसके बाद असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह (1930), तथा भारत छोड़ो आंदोलन (1942) जैसे बड़े आंदोलनों में उन्होंने अहिंसा और सविनय अवज्ञा का प्रयोग किया.
- सत्याग्रह: अत्याचार के विरुद्ध शांतिपूर्ण प्रतिकार की विधि।
- अहिंसा: हर हालत में हिंसा न करने का सिद्धांत, जिसकी प्रेरणा प्राचीन भारतीय विचार, शांति और करुणा से ली गई थी।
महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांतों को स्वतंत्रता संग्राम का आधार बनाया और जीवनभर इनके प्रेरक बने।
सत्याग्रह की अवधारणा
- सत्याग्रह का अर्थ है ‘सत्य के लिए आग्रह’ और ‘सत्य की शक्ति’। गांधी जी ने इसका सूत्रपात 1894 में दक्षिण अफ्रीका में किया, जहाँ उन्होंने भेदभावपूर्ण कानूनों के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध अपनाया। सत्याग्रही हमेशा सत्य, प्रेम और अहिंसा का पालन करता है, और संघर्ष के दौरान विरोधी का हृदय बदलने का प्रयास करता है.
- भारत में पहला सत्याग्रह आंदोलन 1917 में चंपारण में हुआ, जहाँ किसानों की समस्याओं का अहिंसक समाधान हुआ। इसके बाद खेड़ा, खिलाफत, असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन ने गोरा हुकूमत के खिलाफ जनता को प्रेरित किया.
अहिंसा का महत्व
- गांधीजी के अनुसार, अहिंसा केवल हिंसा न करना ही नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म में किसी के प्रति बैर न रखना है। उन्होंने सिखाया कि सबसे कमजोर व्यक्ति भी अहिंसा और आत्मबल से अत्याचारी को झुका सकता है.
- सत्याग्रह और अहिंसा ने भारतीय समाज को सामाजिक न्याय, एकता और आत्म-सम्मान के रास्ते पर अग्रसर किया। विदेशों में भी इन मूल्यों ने मानवाधिकार आंदोलनों को नई दिशा दी.
गांधीजी के सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांत आज भी न्याय, मानवता और शांति की प्रेरणा हैं।
गांधीजी ने अपने जीवन में सच्चाई और आत्मशुद्धि के लिए लंबे उपवास किए, साधारण वस्त्र (धोती और शॉल) पहनी, और स्वदेशी के लिए चरखा चलाकर कपड़ा बनाया। वे समाज में महिला अधिकार, अस्पृश्यता उन्मूलन और आत्मनिर्भरता के प्रचारक रहे.
सामाजिक और नैतिक योगदान
महात्मा गांधी का सामाजिक और नैतिक योगदान भारतीय समाज के हर स्तर पर प्रभावशाली एवं क्रांतिकारी रहा।
सामाजिक सुधार के क्षेत्र में गांधीजी की भूमिका:
- अस्पृश्यता एवम् जातिवाद का विरोध: गांधीजी ने ‘हरिजन आंदोलन’ के माध्यम से दलितों और अछूतों के हित के लिए संघर्ष किया। उन्होंने मंदिर प्रवेश और शिक्षा के अधिकार दिलाने के लिए अभियान चलाया। दलितों को ‘हरिजन’ (ईश्वर के लोग) कहकर सम्मान दिया.
- स्त्री सशक्तिकरण: गांधीजी ने महिलाओं की भागीदारी के बिना कोई भी सामाजिक क्रांति असंभव माना। उन्होंने महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन, खादी निर्माण, और राजनीतिक कार्यों में प्रोत्साहित किया.
- स्वच्छता और शिक्षा: गांधीजी ने ग्रामीण स्वच्छता, प्राथमिक शिक्षा (नई तालीम), और व्यावहारिक शिक्षा प्रणाली की पहल की.
- सर्वोदय और शोषणमुक्त समाज: उन्होंने सर्वोदय (सभी का कल्याण) और शोषण विहीन समाज की अवधारणा दी। लोगों के व्यक्तिगत विकास और सामाजिक न्याय को प्राथमिकता दी.
- सांप्रदायिक सद्भाव और एकता: गांधीजी ने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए उपवास और शांति प्रयास किए, और धार्मिक सहयोग की भावना को प्रबल किया.
- स्वदेशी वस्त्र और आर्थिक आत्मनिर्भरता: उन्होंने अंग्रेजी सामानों के बहिष्कार वाले आंदोलनों में खादी और स्वदेशी की वकालत की, जिससे ग्रामीण उद्योग को बल मिला और आत्मनिर्भरता बढ़ी.
नैतिक नेतृत्व
- गांधीजी का जीवन सादगी, सचाई, और आत्मशुद्धि का प्रतीक रहा। उन्होंने उपवास, शाकाहारी भोजन, सत्य-पालन, और व्यक्तिगत अनुशासन को अपने आचरण के अभिन्न भाग बनाए रखा. वे समाज के प्रत्येक व्यक्ति को आत्मचिंतन, सेवा और सहयोग के लिए प्रेरित करते रहे.
गांधीजी के सामाजिक और नैतिक विचारों ने भारत को जातिगत भेदभाव, असमानता और सांप्रदायिकता जैसी समस्याओं से लड़ने के लिए जन-जागरण दिया। उनका योगदान आज भी समाज के उत्थान का मार्गदर्शन करता है.
स्वतंत्रता के बाद गांधीजी ने हिंदू-मुस्लिम एकता, सामाजिक समानता और आर्थिक सुधार के लिए कई कार्य किए। उनकी सादगी और आदर्शों के कारण वे भारतीयों के लिए ‘बापू’ (पितातुल्य) बन गए.
भारत की आज़ादी के बाद महात्मा गांधी का जीवन
भारत की आज़ादी के बाद महात्मा गांधी का जीवन मुख्यतः सामाजिक सुधार और देश के पुनर्निर्माण पर केंद्रित था। स्वतंत्रता के बाद भी उन्होंने सामाजिक कुरीतियों जैसे अस्पृश्यता के खिलाफ संघर्ष जारी रखा और गांवों के विकास पर विशेष ध्यान दिया।
उन्होंने शराब बंदी अभियान, शिक्षा के सुधार, महिलाओं के अधिकारों की बढ़ावा, और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए ‘स्वदेशी’ को प्रोत्साहित किया। गांधीजी ने देश के जटिल राजनीतिक मसलों पर भी विचार व्यक्त किए, लेकिन सत्ता और राजनीतिक शक्ति में सक्रिय रूप से शामिल नहीं हुए।
1947 के बाद भारत विभाजन से वे बहुत आहत हुए और दोनों पक्षों के बीच तनाव और हिंसा कम करने के लिए प्रयत्नशील रहे। वे लोगों को शांति और सहिष्णुता का संदेश देते रहे।
30 जनवरी 1948 को गांधीजी की नाथूराम गोडसे द्वारा हत्या कर दी गई। उनकी विरासत आज भी भारत और विश्व में अहिंसा, सत्य और नागरिकता के आदर्शों के रूप में जीवित है।

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