नवरात्रि त्योहार | Navratri Festival

भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक नवरात्रि त्योहार है, जो हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है। नवरात्रि का अर्थ होता है “नौ रातें” और यह नौ दिनों तक मनाया जाता है। इस त्योहार का मुख्य उद्देश्य देवी माँ दुर्गा और उनके नौ रूपों की पूजा करना है, जो शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक होती हैं।
नवरात्रि का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत गहरा है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, देवी दुर्गा ने नौ दिनों और नौ रातों तक महिषासुर नामक राक्षस से युद्ध किया और उसे पराजित किया। इसी कारण से यह त्यौहार शक्ति की पूजा और आध्यात्मिक ऊर्जा के समर्पण का समय होता है।
भारत में साल में चार बार नवरात्रि आते हैं, लेकिन सबसे प्रसिद्ध और व्यापक रूप से मनाया जाने वाला होता है शारदीय नवरात्रि, जो माह आश्विन (सितंबर-अक्टूबर) में पड़ता है। इस दौरान नौ दिनों तक देवी के नौ रूपों (जैसे शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, कूष्मांडा आदि) की पूजा की जाती है।
नवरात्रि के दिनों में श्रद्धालु व्रत रखते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं, और संगीत एवं नृत्य जैसे गरबा और डांडिया जैसे पारंपरिक लोकनृत्यों के माध्यम से देवी की भक्ति व्यक्त करते हैं। गुजरात में यह त्योहार विशेष रूप से गरबा और डांडिया नृत्य के लिए प्रसिद्ध है।
इस त्योहार का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी है क्योंकि यह लोगों को एक साथ जोड़ता है और जीवन में पॉजिटिविटी, ऊर्जा, और नयी शुरुआत का संदेश देता है।
इस साल (2025) नवरात्रि
इस साल (2025) चैत्र नवरात्रि 30 मार्च से शुरू होकर 6 अप्रैल तक रहेगी, जिसमें कुल 8 दिन तक नवरात्रि पूजा होगी। इस साल चैत्र नवरात्रि 9 नहीं बल्कि 8 दिन की है क्योंकि पंचमी तिथि का क्षय हो रहा है। नवरात्रि के अंतिम दिन 6 अप्रैल को नवमी और रामनवमी का पर्व मनाया जाएगा। शारदीय नवरात्रि इस साल 22 सितंबर से शुरू होकर 2 अक्टूबर तक रहेगी।
इस प्रकार,
- शारदीय नवरात्रि 2025: 22 सितंबर से 2 अक्टूबर तक
- शारदीय नवरात्रि 2025 के लिए कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त 22 सितंबर, सोमवार को सुबह 6:16 बजे से लेकर सुबह 8:07 बजे तक है। इस दिन प्रतिपदा तिथि के प्रारंभ के साथ कलश स्थापना की जाती है, जो नवरात्रि के आरंभ का प्रतीक है।
- साथ ही अभिजित मुहूर्त भी इस दिन सुबह 11:49 बजे से दोपहर 12:38 बजे तक है, जब कलश स्थापना की जा सकती है। इस मुहूर्त में कलश स्थापना करने से विशेष धार्मिक लाभ मिलने की मान्यता है।
- इस प्रकार, 22 सितंबर 2025 को सुबह 6:16 से 8:07 बजे के बीच या सुबह 11:49 से 12:38 बजे के बीच कलश स्थापना का मुहूर्त है।
- शारदीय नवरात्रि 22 सितंबर 2025 से शुरू होकर 2 अक्टूबर 2025 तक चलेगी।
ये प्रमुख नवरात्रि त्यौहार हैं जो इस साल मनाए जाएँगे।
यदि आप खास तौर पर किस नवरात्रि की तारीख जानना चाहते हैं तो कृपया बताएं। वार्षिक नवरात्रि के अलावा साल में कुल चार नवरात्रि होते हैं, जिनमें प्रमुख चैत्र और शारदीय नवरात्रि हैं
संक्षेप में, नवरात्रि:
- नौ दिनों तक मनाया जाने वाला हिंदू त्योहार है।
- देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा का पर्व है।
- बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
- पूरे भारत में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
- गरबा, डांडिया जैसे सांस्कृतिक नृत्य इस त्योहार की प्रमुख विशेषताएं हैं।
नौ दिनों तक मनाया जाने वाला हिंदू त्योहार है | Nine days Festival
भारत में नवरात्रि का मुख्य त्योहार बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इसका आयोजन कई धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों के जरिए होता है, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:
- पूजा और व्रत:
- नवरात्रि के नौ दिनों तक देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है।
- श्रद्धालु व्रत रखते हैं, जिसमें कुछ लोग पूरे नौ दिन या कुछ विशेष दिन उपवास करते हैं।
- रोज सुबह-शाम पूजा, आरती, भजन-कीर्तन, और हवन जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।
- खास कार्यक्रम:
- गुजरात में गरबा और डांडिया नृत्य बड़े पैमाने पर पूरे नौ रातों तक चलते हैं। लोग पारंपरिक वस्त्रों (महिलाएं चणिया चोली और पुरुष कुर्ता-पायजामा) में सज-धजकर नृत्य करते हैं।
- पश्चिम बंगाल में इसे दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है, जहां बड़ी झांकियां सजाई जाती हैं और पांच दिनों तक पूजा-अर्चना चलती है।
- उत्तर भारत में रामलीला का आयोजन होता है, जिसमें भगवान राम और रावण के युद्ध का नाटक प्रस्तुत किया जाता है, और दशहरे (विजयदशमी) पर रावण, मेघनाथ और कुम्भकर्ण के पुतले जलाए जाते हैं।
- कन्या पूजन:
- नवरात्रि के अंतिम दिनों में कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है, जिसमें नौ कन्याओं को देवी का रूप मानकर भोजन, उपहार, और आशीर्वाद दिया जाता है।
- सजावट और आयोजन:
- घर, मंदिर, और सार्वजनिक स्थानों को फूल, रंग-बिरंगे कपड़े, और दीपों से सजाया जाता है।
- मंदिरों में विशेष पूजा, भंडारा, और धार्मिक आयोजन होते हैं।
- सामाजिक उत्सव:
- नवरात्रि समाज में मेल-जोल बढ़ाने का अवसर होती है। परिवार, मित्र, और समुदाय के लोग मिलकर त्योहार की खुशियां साझा करते हैं।
इस प्रकार, भारत में नवरात्रि का त्योहार धार्मिक भक्ति, सांस्कृतिक नृत्य-गीत, उपवास और उत्सव के साथ विविध रूपों में मनाया जाता है, जो हर क्षेत्र की अपनी अनूठी परंपराओं को दर्शाता है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व होने के साथ ही आध्यात्मिक उन्नति का भी माध्यम है।
देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा | Devi Durga ke no rupo ki pooja
देवी दुर्गा के नौ रूप जिन्हें नवरात्रि में पूजाऐं जाती हैं, ये निम्नलिखित हैं:
- शैलपुत्री (पर्वत की पुत्री)
- ब्रह्मचारिणी (तपस्या का स्वरूप)
- चंद्रघंटा (शक्ति और साहस का रूप)
- कूष्माण्डा (सृष्टि की रचयिता)
- स्कंदमाता (माता के रूप में)
- कात्यायनी (महिषासुर मर्दिनी)
- कालरात्रि (भयंकर और उग्र स्वरूप)
- महागौरी (शांत और पावन स्वरूप)
- सिद्धिदात्री (सिद्धि देने वाली)
ये नौ रूप देवी दुर्गा की अलग-अलग शक्तियों और पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं और नवरात्रि के नौ दिनों में इनकी पूजा की जाती है। प्रत्येक रूप का अपना विशेष महत्व और कहानी है जो स्त्री के जीवन के विभिन्न चरणों और शक्तियों की प्रस्तुति करता है।
कलश स्थापना की विधि | Kalash sthapana ki vidhi

- स्थान चयन: कलश को घर में ईशान कोण या पूर्व-उत्तर दिशा में रखें।
- कलश की सामग्री:
- गंगाजल से भरा हुआ कलश
- उसमें दूर्वा घास, सिक्का, सुपारी डालें
- कलश के ऊपर 8 आम के पत्ते लगाएं (अष्टभुजी देवी के प्रतीक)
- कलश स्थापना:
- मिट्टी के पात्र में जौ बोएं और उसके ऊपर कलश रख दें।
- कलश पर स्वास्तिक और लाल कपड़ा बांधें।
- पूजा सामग्री: लाल कपड़ा, दीया, कलावा, फूल, फल, गुड़, हल्दी की गांठ, सिंदूर, मिठाई, अक्षत, नारियल, गंगाजल, अगरबत्ती, पंचामृत इत्यादि।
- पूजा और मंत्र:
- मां दुर्गा का ध्यान करते हुए कलश की स्थापना करें।
- पंचों बेला (दीपक) जलाएं: घी का दीपक दाईं ओर और तेल का दीपक बाईं ओर रखें।
- माँ दुर्गा के मंत्रों का जाप करें और आरती करें।
- करे अखंड ज्योति प्रज्वलित: जो नौ दिनों तक जलती रहे।
अन्य विशेष बातें
- कलश स्थापना के समय मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना करते हैं।
- कलश के मुख पर विष्णु, कंठ पर शिव और मूल में ब्रह्माजी का वास माना जाता है।
- कलश स्थापना से समृद्धि, सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
इस प्रकार शुभ मुहूर्त में विधिपूर्वक कलश स्थापना कर मां दुर्गा की पूजा करें तो नवरात्रि का आयोजन सफल व शुभ होगा।
कलश स्थापना के दौरान निम्न प्रमुख मंत्रों का जप
- कलश स्थापना मंत्र
“ॐ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः। पुनरूर्ज नि वर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशतादयिः।।”
यह मंत्र कलश की स्थापना के समय पढ़ा जाता है। - कलश के नीचे जौ या सप्तधान्य रखने का मंत्र
“ॐ धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणाय त्यो दानाय त्वा व्यानाय त्वा। दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रति गृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि।।”
इसे बोलते हुए भूमि पर जौ या सप्तधान्य बिछाया जाता है। - कलश में जल भरते समय मंत्र
“ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्काभसर्जनी स्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमा सीद।।” - कलश में चंदन अर्पित करने का मंत्र
“ॐ त्वां गन्धर्वा अखनस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः। त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान् यक्ष्मादमुच्यत।।” - कलश में सर्वौषधि डालने का मंत्र
“ॐ या ओषधी: पूर्वाजातादेवेभ्यस्त्रियुगंपुरा। मनै नु बभ्रूणामह ग्वंग शतं धामानि सप्त च।।” - कलश पर पंच पल्लव रखने का मंत्र
“ॐ अश्वस्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता।। गोभाज इत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम्।।” - कलश में सुपारी और सिक्का रखने के मंत्र
सुपारी: “ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पायाश्च पुष्पिणीः। बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्व ग्वंग हसः।।”
सिक्का: “ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।।” - कलश को वस्त्र अर्पित करते समय मंत्र
“ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमाऽसदत्स्वः। वासो अग्ने विश्वरूप ग्वंग सं व्ययस्व विभावसो।।” - कलश पर नारियल स्थापित करते समय मंत्र
“ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः। बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्व हसः।।” - कलश में वरुण सहित सभी देवताओं का आह्वान मंत्र
“ॐ तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः। अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुश ग्वंग स मा न आयुः प्र मोषीः। अस्मिन् कलशे वरुणं साङ्गं सपरिवारं सायुधं सशक्तिकमावाहयामि। ओम भूर्भुवः स्वः भो वरुण, इहागच्छ, इह तिष्ठ, स्थापयामि, पूजयामि, मम पूजां गृहाण। ‘ॐ अपां पतये वरुणाय नमः’।”
इन मंत्रों का जप करते हुए कलश स्थापना की जाती है, जिससे पूजा पूर्ण होती है और शुभ फल प्राप्त होते हैं। यदि आप चाहें तो मैं इन मंत्रों का विस्तार से उच्चारण भी बता सकता हूँ। यह मंत्र नवरात्रि के कलश स्थापना के लिए विशेष रूप से उपयोग में लाये जाते हैं।
बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक | Burai par achchhai ki jeet
नवरात्रि बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। यह त्योहार देवियों की भक्ति और दुर्गा मां के विभिन्न रूपों की पूजा करने का समय होता है। नवरात्रि के नौ दिनों में देवी दुर्गा का महिषासुर नामक राक्षस पर विजयी होना बुराई पर अच्छाई की जीत का उल्लेख करता है।
नवरात्रि के बाद मनाया जाने वाला दशहरा या विजयादशमी भी इसी भावना को समर्पित है। दशहरा भगवान राम द्वारा दस सिर वाले दुष्ट रावण के वध को दर्शाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं, जो बुराई के अंत का प्रतीक हैं।
इस प्रकार, नवरात्रि और दशहरा मिलकर हमें यह संदेश देते हैं कि न सिर्फ शक्तिशाली देवी की पूजा के माध्यम से बुराई को परास्त किया जा सकता है, बल्कि धर्म, नैतिकता और भक्ति से भी बुराई पर अच्छाई की अनंत विजय होती है। यह पर्व आस्था, भक्ति और सामाजिक उत्सव का समय है जो जीवन में अच्छाई के उजाले का संचार करता है।
संक्षेप में – नवरात्रि बुराई पर अच्छाई की जीत, प्रकाश पर अंधकार, धर्म पर अधर्म की विजय का प्रतीक है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि सच्चाई और धर्म की हमेशा जीत होती है।
नवरात्रि और दशहरा में क्या संबंध है
नवरात्रि और दशहरा का आपस में गहरा संबंध है और ये दोनों त्योहार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं:
- नवरात्रि नौ दिनों का पर्व होता है जिसमें माँ दुर्गा के नौ विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि माँ दुर्गा ने नौ दिनों तक युद्ध करते हुए राक्षस महिषासुर का वध किया। नवरात्रि इस युद्ध और मां दुर्गा की शक्ति का प्रतीक है।
- दशहरा (विजयादशमी) नवरात्रि के बाद दसवें दिन मनाया जाता है। यह दिन माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय, और साथ ही भगवान राम द्वारा रावण के वध का प्रतीक है। राम ने रावण को मारने से पहले नौ दिनों तक माँ दुर्गा की उपासना की थी।
इस प्रकार, नवरात्रि माँ दुर्गा की आराधना और शक्ति संघर्ष का पर्व है, जबकि दशहरा बुराई पर अच्छाई की अंतिम जीत का त्योहार है। नवरात्रि के नौ दिनों के बाद दशहरा आता है, जो नवरात्रि का ऐतिहासिक और धार्मिक समापन भी होता है।
संक्षेप में:
- नवरात्रि नौ दिनों तक माँ दुर्गा की पूजा है।
- दशहरा दसवें दिन माँ दुर्गा या भगवान राम की विजय का उत्सव है।
- दोनों त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के स्वरूप और आध्यात्मिक शक्ति को दर्शाते हैं।
इसलिए नवरात्रि और दशहरा एक दूसरे के पूरक हैं और मिलकर बुराई पर अच्छाई की जीत का व्यापक संदेश देते हैं।
नवरात्रि का धार्मिक महत्त्व | Navratri ka Dharmik Mahatv
- नवरात्रि नौ दिनों का पवित्र पर्व है जिसमें माँ दुर्गा के नौ विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है। ये नौ दिन देवी माँ और उनकी शक्ति की उपासना, भक्ति, और आराधना के लिए समर्पित होते हैं।
- यह पर्व बुराई के प्रतीक राक्षस महिषासुर से देवी दुर्गा की विजय का स्मरण कराता है, जो अच्छाई की जीत का संदेश है।
- नवरात्रि आध्यात्मिक रूप से मनुष्य के भीतर के नेगेटिव गुणों जैसे क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, आदि को समाप्त कर उच्च आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति का प्रतीक है।
- यह पर्व भक्तों को साहस, शक्ति और आत्मा की शुद्धि के लिए प्रेरित करता है। नौ दिन तक तपस्या, व्रत और पूजा के द्वारा आत्मा की ऊर्जा जाग्रत होती है।
दशहरा का धार्मिक महत्त्व

- दशहरा, जो नवरात्रि के बाद दसवें दिन मनाया जाता है, बुराई पर अच्छाई की अंतिम और पूर्ण विजय का प्रतीक है।
- हिन्दू धर्म में यह दिन भगवान राम द्वारा रावण के वध के रूप में प्रसिद्ध है, जो सत्य और धर्म की जीत का संदेश देता है।
- इसी दिन देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था, इसलिए इसे विजयादशमी भी कहा जाता है।
- दशहरा दिन शस्त्र पूजा और नए कार्यों की शुरुआत के लिए शुभ माना जाता है। यह व्यक्ति को पापों और नकारात्मक प्रवृत्तियों से मुक्त होकर धर्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
- यह त्योहार अच्छाई, शौर्य और नैतिकता की जीत का उत्सव है, जिसे समाज में सामूहिक रुप से मनाया जाता है।
सारांश
- नवरात्रि माँ दुर्गा की पूजा और आध्यात्मिक शुद्धि का पर्व है जबकि दशहरा उस पूजा की विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है।
- दोनों पर्व बुराई पर अच्छाई के जश्न और धर्म की विजय का सार प्रस्तुत करते हैं।
इस प्रकार नवरात्रि और दशहरा हिन्दू धर्म में शक्ति, भक्ति, युद्ध, और नैतिकता के महत्व को उजागर करते हैं और जीवन में अच्छाई को प्रोत्साहित करते हैं।
