13/02/2026

दीपावली ( Deepawali )

इस साल 2025 में दीपावली लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त

इस साल 2025 में दीपावली मुख्य रूप से 21 अक्टूबर 2025, मंगलवार को मनाई जाएगी। लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त इस दिन शाम के समय रहेगा। पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि 20 अक्टूबर को रात 12:11 बजे शुरू होगी और 21 अक्टूबर को रात 10:43 बजे समाप्त होगी। दीपावली पर लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त शाम 6:59 बजे से 8:32 बजे तक (भारतीय समय अनुसार) बताया गया है।

संक्षेप में:

  • दीपावली तिथि: 21 अक्टूबर 2025, मंगलवार
  • लक्ष्मी पूजा शुभ मुहूर्त: शाम 6:59 PM बजे से रात 8:32 PM बजे तक
  • अमावस्या तिथि: 20 अक्टूबर रात 12:11 बजे से 21 अक्टूबर रात 10:43 बजे तक

दीपावली पूजन सामग्री सूची (Deepawali Pooja Samagree List)

दीपावली पूजन के लिए निम्नलिखित वस्तुएं आवश्यक हैं:

  • लकड़ी की चौकी
  • लक्ष्मी-गणेश जी की मूर्ति/तस्वीर
  • पीला या लाल कपड़ा
  • अक्षत (चावल)
  • चंदन, केसर
  • सिंदूर, कुमकुम, अबीर, गुलाल
  • कलावा (मौली)
  • हल्दी (पाउडर/गांठ)
  • अष्टगंध
  • जनेऊ
  • कपूर, धूपबत्ती, अगरबत्ती
  • गंगाजल
  • नारियल एवं सूखे नारियल
  • बताशे, खील, मुरमुरे, गट्टे
  • मिठाई, पंचमेवा
  • फल, फूल, फूलमाला, गुलाब/कमल का फूल
  • दीपक (मिट्टी/पीतल के), रुई की बत्ती
  • घी, तेल (सरसों/तिल/सेंसेम), शहद
  • लौंग, इलायची, धनिया साबुत
  • पान के पत्ते, सुपारी, आम के पत्ते, तुलसी दल
  • पंचामृत, दूध, दही, शक्कर, मिष्ठान्न
  • कलश, शंख, सकोरा, लेखनी (कलम), बही-खाता
  • इत्र की शीशी
  • कुड़ियां, गोमती चक्र
  • कुबेर यंत्र
  • पूजा की किताब/लक्ष्मी जी की आरती की कॉपी

दीपावली पूजन विधि (Pooja Vidhi)

  1. स्थल की सफाई: सबसे पहले घर और पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें.
  2. चौकी की स्थापना: लकड़ी की चौकी पर लाल या सफेद कपड़ा बिछाकर लक्ष्मी और गणेश जी की मूर्ति स्थापित करें.
  3. कलश की स्थापना: एक कलश भरकर उसके ऊपर अक्षत और तिलक किया नारियल रखें और मौली बांधें.
  4. दीपक प्रज्ज्वलन: सरसों के तेल का अखंड दीपक जलाना चाहिए जो सारी रात जलता रहे.
  5. पूजा सामग्री व्यवस्था: सभी सामग्री (फूल, धूप, कपूर, मिठाई आदि) भगवान को अर्पित करें.
  6. आसन पर बैठकर मंत्र जाप करें: लक्ष्मी और गणेश जी के मंत्रों का जाप और आरती करें.
  7. कथा वाचन: लक्ष्मी पूजन की कथा सुनें और प्रसाद अर्पित करें.
  8. आरती एवं प्रसाद वितरण: भगवान की आरती करें और प्रसाद वितरण करें.

“पूजा के दौरान शुद्धता और नियम का विशेष ध्यान रखें। पूजा का समय और मुहूर्त स्थानीय पंचांग अनुसार सुनिश्चित करें।”

यह विधि घर-परिवार की धार्मिक परंपरा अनुसार थोड़ी-बहुत भिन्न हो सकती है, लेकिन ऊपर दी गई सामग्री और विधि लगभग सभी हिन्दू घरों में मान्य है।

दीपावली पूजा के बाद घर में आरती का विशेष महत्व होता है। आमतौर पर लक्ष्मी माता, भगवान गणेश और कभी-कभी कुबेर जी की आरती की जाती है। ये आरतियाँ पूजन को पूर्ण करती हैं और शुभता का संचार करती हैं। नीचे दिवाली के बाद की मुख्य आरतियाँ दी गई हैं:

माँ लक्ष्मी जी की आरती

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निसदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता।
ॐ जय लक्ष्मी माता।

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता।
ॐ जय लक्ष्मी माता।

दुर्गा रूप निरंजनी, सुख-संपत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता।
ॐ जय लक्ष्मी माता।

भगवान गणेश जी की आरती

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।

एकदंत, दयावन्त, चार भुजाधारी,
माथे सिंदूर सोहे, मूस की सवारी।

पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा,
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा।
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।

कुबेर जी की आरती (वैकल्पिक)

ॐ जै यक्ष कुबेर हरे,
स्वामी जै यक्ष कुबेर हरे।
शरण पड़े भगतों के,
भण्डार कुबेर भरे।
ॐ जै यक्ष कुबेर हरे।

इन आरतियों के साथ दीपक, कपूर, पुष्प आदि लेकर पूरे परिवार के साथ आरती करनी चाहिए। इससे पूजा का संपूर्ण फल मिलता है और घर में सुख-समृद्धि आती है.

दीवाली पूजा के बाद लक्ष्मी-गणेश की आरती अवश्य करें, इससे पूजा पूर्ण मानी जाती है और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं.

दीपावली मनाने का धार्मिक, सांस्कृतिक, तथा ऐतिहासिक कारण

दीपावली, जिसे दिवाली भी कहा जाता है, भारत का एक प्रमुख त्योहार है और इसे कई धार्मिक, सांस्कृतिक, तथा ऐतिहासिक कारणों से मनाया जाता है। इसके मनाने के मुख्य कारण निम्न हैं:

अंधकार पर प्रकाश की विजय: यह त्योहार प्रतीक है कि अच्छाई हमेशा बुराई पर जीतती है, और प्रकाश अंधकार को दूर करता है।

भगवान राम का अयोध्या लौटना: हिंदू मान्यता अनुसार, भगवान श्रीराम 14 वर्ष के वनवास के बाद रावण का वध करके जब अयोध्या लौटे, तब नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया। इसी खुशी में दीपावली का पर्व मनाया जाता है।

माता लक्ष्मी का प्राकट्य: समुद्र मंथन के समय धन की देवी लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। इसलिए इस दिन माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है और समृद्धि की कामना की जाती है

भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर वध: एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध कर उसके द्वारा क़ैद 16,000 रानियों को मुक्त किया था। इसी जीत के प्रतीक रूप में दिवाली मनाई जाती है।

धार्मिक कारण

  • रामायण की कथा: दीपावली मुख्यतः भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के 14 वर्ष वनवास के बाद अयोध्या वापस लौटने की खुशी में मनाई जाती है। अयोध्यावासियों ने उनका स्वागत दीप जलाकर किया था, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।
  • लक्ष्मी पूजन: समुद्र मंथन के समय देवी लक्ष्मी का प्रकट होना और भगवान विष्णु से उनका विवाह भी इस दिन हुआ था, इसलिए इस दिन लक्ष्मी पूजन की परंपरा है। देवी लक्ष्मी को धन और समृद्धि की देवी माना जाता है।
  • नरकासुर वध: द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध इसी दिन किया था, जिससे प्रजा को भयमुक्त किया गया।
  • अन्य धार्मिक तिथियाँ: इस दिन जैन धर्म में भगवान महावीर का निर्वाण, सिख धर्म में गुरु हरगोबिन्द सिंह जी की कारागार से रिहाई जैसे अनेक धार्मिक कारण हैं।

सांस्कृतिक कारण

  • एकता व उल्लास: दीपावली समाज और परिवार को जोड़ने वाला, आशा और सकारात्मकता का त्योहार है, जिसमें सभी वर्ग और पृष्ठभूमि के लोग सहभागी होते हैं। यह सामूहिक सामाजिक उल्लास का पर्व है, जिसमें मिलजुल कर दीप जलाए जाते हैं, मिठाइयां बांटी जाती हैं, अतिथि-सत्कार व सामुदायिक भोज होते हैं।
  • अंधकार से प्रकाश की ओर प्रेरणा: उपनिषदों की ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ यानी अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली प्रेरणा भी दीपावली के तात्पर्य में समाहित है।
  • आध्यात्मिक विकास: दीपावली आत्मनिरीक्षण और नैतिक विकास का भी प्रतीक है। यह सत्कर्म, धार्मिकता, प्रेम और करुणा की भावना को सुदृढ़ करती है।

ऐतिहासिक कारण

  • विक्रम संवत की स्थापना: राजा विक्रमादित्य ने दीपावली के दिन ‘विक्रम संवत’ की स्थापना की थी।
  • सिख और आर्य समाज: अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की नींव भी इसी दिन रखी गयी थी और आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती का भी इसी दिन निर्वाण हुआ था।
  • नेपाल संवत: इस दिन से नेपाल संवत के नए वर्ष की शुरुआत भी होती है।

दीपावली इन प्रमुख धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कारणों से भारत ही नहीं, विश्वभर में बड़े उल्लास से मनाई जाती है और अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देती है।

दिवाली का धार्मिक इतिहास रामायण से कैसे जुड़ता है

दीवाली का धार्मिक इतिहास रामायण से गहराई से जुड़ा हुआ है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान श्रीराम ने माता सीता को रावण की कैद से मुक्त कराया और 14 वर्ष का वनवास पूरा कर अपने भाई लक्ष्मण और सीता के साथ अयोध्या लौटे, तो अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत में सम्पूर्ण अयोध्या को दीपों से प्रकाशित किया था। इसी उपलक्ष्य में हर वर्ष कार्तिक अमावस्या की रात “दीपों का पर्व” मनाया जाता है। यह परंपरा रामायण एवं तुलसीदास की रामचरितमानस जैसे ग्रंथों में भी वर्णित है, जिनमें कहा गया है कि भगवान राम के स्वागत हेतु नगरवासियों ने दीप जलाए थे और तभी से यह उत्सव सामाजिक स्मृति में स्थायी बन गया है।

यह कथा, धर्म और संस्कृति में अच्छाई की बुराई पर विजय, अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा, और सत्य एवं धर्म की स्थापना का प्रतीक है। उस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में ही आज भी दीपावली धूमधाम से मनाई जाती है।

नरक चतुर्दशी

नरक चतुर्दशी जिसे छोटी दिवाली भी कहा जाता है, यह दीपावली (Deepawali) त्योहार से एक दिन पहले मनाई जाती है। यह त्योहार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आता है और 2024 में यह 30 अक्टूबर को मनाई जाएगी।

नरक चतुर्दशी कब मनाई जाती है?

  • नरक चतुर्दशी कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है।
  • इस दिन नरकासुर नामक राक्षस का भगवान श्रीकृष्ण ने वध किया था।
  • इसका मतलब है छोटी दिवाली के दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर को हराकर बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक प्रस्तुत किया था।

नरक चतुर्दशी क्यों मनाई जाती है?

  • इस दिन की पूजा, दीपदान, और स्नान करने से नरक (नरकासुर के वधिकृत यानि नरक) में मिलने वाली यातनाओं से मुक्ति मिलती है।
  • यमराज की पूजा की जाती है और यम के नाम पर दीपक जलाये जाते हैं जिससे अकाल मृत्यु और अन्य कष्टों से रक्षा होती है।
  • यह त्योहार बुराई पर अच्छाई, अज्ञान पर ज्ञान और अंधकार पर प्रकाश की जीत का प्रतीक है।
  • यह दिन आध्यात्मिक रूप से आत्मा की शुद्धि का भी है, जहां लोग अपने अंदर की नकारात्मकता को दूर करते हैं।

गोवर्धन पूजा ( Govardhan Pooja )

गोवर्धन पूजा दीपावली के ठीक अगले दिन मनाई जाती है, जो कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को आती है।

कब मनाई जाती है गोवर्धन पूजा?

  • दीपावली के अगले दिन यानी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा होती है।
  • यह त्योहार 2024 में दीपावली के दिन के अगले दिन मनाई जाएगी।

गोवर्धन पूजा की विधि (Govardhan Puja Vidhi) इस प्रकार है:

  1. स्नान और तैयारी
    प्रातःकाल उठकर शरीर पर तेल लगाएं और स्नान करें।
  2. गोवर्धन पर्वत बनाना
    घर के आंगन या मुख्य द्वार के पास गाय के गोबर से लेटे हुए पुरुष के रूप में गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाएं।
    इसे फूल, पत्तियां, टहनियां, और गाय-बैल के छोटेनुमा आकार से सजाएं।
    भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा या तस्वीर को गोवर्धन पर्वत के बीच में रखें।
  3. नाभि का दीपक
    गोवर्धन पर्वत की नाभि के स्थान पर मिट्टी या कटोरी का दीपक रखें, जिसमें दूध, दही, शहद, गंगाजल, और बताशे डालें।
  4. पूजा सामग्री
    रोली, अक्षत (अक्षत अर्थात चावल), जल, दूध, फूल, पान, खील, बताशे, नैवेद्य, केसर, धूप, दीप, कलश आदि सामग्री रखें।
  5. पूजा एवं अर्चना
    • गोवर्धन पर्वत की विधिपूर्वक पूजा करें।
    • भगवान कृष्ण और गोवर्धन देव की कथा का पाठ या स्मरण करें।
    • सात बार गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करें, परिक्रमा के दौरान जल (गंगाजल) गिराएं और जौ के दाने बोते हुए जयकार करें।
  6. गाय और बैल की पूजा
    इस दिन गाय-बैल को स्नान करवाकर सिंदूर, फूल और माला से सजाएं, और उनकी भी पूजा करें।
    उनके लिए गुड़ और घी का भोग भी लगाएं।
  7. आरती और प्रसाद वितरण
    पूजा के बाद आरती करें और अन्नकूट (भोजन या 56 प्रकार के व्यंजन) अर्पित करके प्रसाद के रूप में बांटें।
  8. मंत्र जाप
    पूजा के समय और परिक्रमा के दौरान मनोनुकूल मंत्रों का जाप करें, जिससे लक्ष्मी एवं भगवान कृष्ण प्रसन्न होते हैं।

यह पूजा भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाकर गांववासियों और पशुओं की रक्षा करने की कथा को स्मरण करते हुए की जाती है, जो प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा का आशीर्वाद देती है।

गोवर्धन पूजा क्यों मनाई जाती है?

  • इस पूजा की पौराणिक कथा भागवत पुराण में वर्णित है। वृंदावन के लोगों ने भगवान कृष्ण के कहने पर वर्षा के देवता इंद्र के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा की।
  • इंद्र देव क्रोधित हो गए और वृंदावन पर भारी वर्षा की।
  • बचाव के लिए भगवान कृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर सात दिन तक गोवर्धन पर्वत उठा रखा, जिससे वे और जानवर सुरक्षित रहे।
  • बाद में इंद्र देव ने माफी मांगी और कृष्ण ने पर्वत को नीचे रखा।
  • तब से यह पूजा अन्नकूट उत्सव के रूप में मनाई जा रही है जिसमें गोवर्धन पर्वत का मॉडल बनाकर पूजा की जाती है।
  • इस दिन गायों की भी पूजा होती है क्योंकि गायों को लोक हिन्दू धर्म में देवी लक्ष्मी का रूप माना जाता है।

महत्व

  • गोवर्धन पूजा प्रकृति और मानव के बीच के संबंध को दर्शाती है।
  • यह पूजा समृद्धि, सुरक्षा, और भगवान कृष्ण के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का प्रमाण है।
  • अन्नकूट (56 प्रकार के व्यंजनों का भोग) भी इसी दिन लगाया जाता है।

गोवर्धन पूजा का इतिहास:

  • गोवर्धन पूजा का त्योहार भागवत पुराण की एक प्रसिद्ध कथा पर आधारित है।
  • पुराणों के अनुसार, वृंदावन के लोग वर्षा के देवता इन्द्र की पूजा करते थे, क्योंकि वे मानते थे कि इन्द्र की वर्षा से अन्न की पैदावार होती है और उनकी गायों को चारा मिलता है।
  • भगवान कृष्ण ने कहा कि इन्द्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि गोवर्धन पर्वत ही वे प्राकृतिक संसाधन देता है जिनसे लोग और जानवर जीवित रहते हैं।
  • इन्द्र देव को यह अपमान लगा और उन्होंने क्रोधित होकर मूसलधार बारिश शुरू कर दी।
  • लोगों की सुरक्षा के लिए भगवान कृष्ण ने अपनी सबसे छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को सात दिन तक उठाकर रखा, ताकि वे, उनके परिवार और पशु-पालन सुरक्षित रहें।
  • सात दिनों की इस भारी बारिश के बाद इन्द्र ने कृष्ण से क्षमा माँगी और इस घटना के बाद से गोवर्धन पर्वत की पूजा अन्नकूट उत्सव के रूप में धूमधाम से मनाई जाती है।

कृष्ण से संबंध:

  • भगवान कृष्ण की यह लीला दर्शाती है कि वे प्रकृति के रक्षक हैं और अपने भक्तों की रक्षा के लिए किसी भी स्थिति में सहायता प्रदान करते हैं।
  • गोवर्धन पूजा में कृष्ण की महिमा और उनकी शक्ति की श्रद्धांजलि दी जाती है।
  • यह पर्व बृज क्षेत्र में विशेष रूप से धूमधाम से मनाया जाता है, क्योंकि वहाँ कृष्ण का बाल्यकाल रहा और यह उनकी लीलाओं से जुड़ा है।
  • पूजा में गायों (गोमाता) की भी विशेष पूजा होती है, जो समृद्धि और स्वास्थ्य का प्रतीक हैं, और जिन्हें कृष्ण ने अपनी बाल लीला में हमेशा संरक्षण दिया।

संक्षेप में, गोवर्धन पूजा भगवान कृष्ण की उस दिव्य लीला का स्मरण है जिसमें उन्होंने इन्द्र के अहंकार को परास्त कर गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाकर बृजवासियों और उनके पशुओं को बाढ़ से बचाया। इसे अन्नकूट उत्सव के रूप में मनाया जाता है और यह प्रकृति, सुरक्षा और आभार व्यक्त करने का त्योहार है.

दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा कर भगवान कृष्ण की लीला और वृंदावनवासियों की रक्षा की स्मृति में इस पर्व को मनाया जाता है। इसके साथ ही गायों और प्रकृति की भी पूजा की जाती है, जो समृद्धि और सुरक्षा का प्रतीक है.

भाई दूज दीपावली के बाद भाई दूज मनाया जाता है

भाई दूज दीपावली के बाद कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। साल 2025 में भाई दूज का त्योहार 23 अक्टूबर को मनाया जाएगा।

भाई दूज कब मनाया जाता है?

  • यह दीपावली के दो दिन बाद आता है।
  • हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भाई दूज मनाया जाता है।
  • इस दिन बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक करती हैं, उनकी लंबी आयु, सुख- समृद्धि और रक्षा की कामना करती हैं।

भाई दूज क्यों मनाया जाता है?

  • भाई दूज भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का पर्व है जो उनके रिश्ते को मजबूत करता है।
  • यह त्यौहार मृत्यु के देवता यमराज की पूजा से भी जुड़ा है। पौराणिक कथा अनुसार यमराज अपनी बहन यमुनाजी के घर इस दिन मिलने आए थे, जहां उन्होंने बहन का तिलक और सम्मान प्राप्त किया था।
  • यमराज ने उस दिन का वरदान दिया कि जो भाई इस दिन अपनी बहन से तिलक करवाकर भोजन करता है, उसे यमलोक का भय नहीं रहता।
  • इस दिन बहनें भाई को तिलक लगाकर उनके लिए सुख, समृद्धि और लंबी आयु की प्रार्थना करती हैं, तथा भाई उन्हें उपहार देते हैं।

इस प्रकार भाई दूज भाई-बहन के पवित्र बंधन और सुरक्षा का प्रतीक है, जो परिवार में आपसी प्रेम और सद्भाव को बढावा देता है.

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