11/02/2026

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ( Dr. Bhimrao Ambedkar )

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ( Dr. Bhimrao Ambedkar )

भारतीय संविधान के शिल्पकार और सामाजिक सुधारक

भारत के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जिनके कार्य और विचार सदियों तक पीढ़ियों को प्रेरित करते हैं। डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर (1891–1956) उनमें से एक अमर क्रांतिकारी थे। उनका जीवन असमानता और शोषण के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक है। वे एक उत्कृष्ट विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, शिक्षाविद, समाज सुधारक और सबसे बढ़कर कमजोर वर्गों के उद्धारक थे। उन्हें स्नेहपूर्वक “बाबासाहेब” कहा जाता है।

डॉ. अम्बेडकर ने दलित, पिछड़े, स्त्री और समाज के वंचित वर्गों की आवाज़ को बुलंदी दी। उन्होंने जातिवाद, भेदभाव, छुआछूत और असमानता के विरुद्ध आजीवन संघर्ष किया। यही कारण है कि उन्हें “भारतीय संविधान के निर्माता” ही नहीं बल्कि “सामाजिक क्रांति के जनक” भी कहा जाता है।

जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू (अब डॉ. अंबेडकर नगर) में हुआ।

उनके पिता रामजी मालोजी सकपाल ब्रिटिश भारतीय सेना में सूबेदार थे।

माता का नाम भीमाबाई था।

परिवार महार जाति से संबंधित था, जिसे उस समय समाज में “अस्पृश्य” माना जाता था। इस कारण बचपन से ही बाबासाहेब को सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा। उनका मूल उपनाम “सकपाल” था। बाद में उनके शिक्षक ने उन्हें “अंबडवेकर” लिखा, जो बाद में “आंबेडकर” हो गया।

बचपन और छुआछूत का अनुभव

बाल्यावस्था से ही डॉ. अम्बेडकर ने जातिगत भेदभाव की पीड़ा को महसूस किया। उन्हें स्कूल में अलग बैठाया जाता, पानी छूने नहीं दिया जाता, और ऊँची जाति के बच्चे उन्हें अपने पास नहीं बैठाते। इन कटु अनुभवों ने उनके अंतर्मन में गहरी छाप छोड़ी और वे संकल्पित हुए कि समाज में व्याप्त अन्याय को समाप्त करना है।

शिक्षा – ज्ञान की तपस्या

डॉ. अम्बेडकर का जीवन शिक्षा के प्रति अदम्य लगन का उदाहरण है। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने ज्ञान प्राप्ति की ऊँचाई पाई।

  • प्राथमिक शिक्षा : सतारा और दादर में।
  • हाई स्कूल : एलफिंस्टन हाई स्कूल, मुंबई। वे अपने समाज में पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मैट्रिक पास की।
  • स्नातक : 1912 में मुंबई विश्वविद्यालय से बी.ए. (रामजी पाठशाला और एलफिंस्टन कॉलेज से)।
  • अमेरिका प्रवास : कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क। यहाँ उन्होंने अर्थशास्त्र में M.A. और फिर Ph.D. किया।
  • लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स : यहाँ उन्होंने D.Sc. (Economics) प्राप्त किया और बैरिस्टर बने।
  • जर्मनी, इंग्लैंड और अमेरिका में अध्ययन : उन्होंने कानून, राजनीति, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में गहन विद्वत्ता प्राप्त की।

उनकी शिक्षा ने उन्हें वैश्विक दृष्टिकोण दिया।

सामाजिक सुधारक के रूप में भूमिका

डॉ. अम्बेडकर का मुख्य लक्ष्य समाज में समानता स्थापित करना और दलितों व कमजोर वर्गों को उनका अधिकार दिलाना था।

(a) अस्पृश्यता के खिलाफ आंदोलन

उन्होंने महाड़ (1927) में “चवदार तालाब सत्याग्रह” चलाकर दलितों को पानी पीने का अधिकार दिलाया।

(b) मंदिर प्रवेश आंदोलन

नासिक के “कालाराम मंदिर सत्याग्रह” के माध्यम से उन्होंने धार्मिक स्थलों पर प्रवेश की बाधा तोड़ी।

(c) शिक्षा और संगठन

  • “बहिष्कृत हितकारिणी सभा” (1924) की स्थापना।
  • छात्रावास, पुस्तकालय और शैक्षणिक संस्थानों की शुरूआत।

(d) राजनीतिक अधिकार

उन्होंने “स्वतंत्र दलित राजनीतिक प्रतिनिधित्व” की माँग की और बाद में “शेड्यूल कास्ट फेडरेशन” का गठन किया।

(e) महिलाएँ और दलित उत्थान

उन्होंने स्त्रियों को समान अधिकार दिए जाने की वकालत की और दलित समाज से बाल–विवाह तथा अन्य कुप्रथाओं को दूर किया।

भारतीय संविधान के निर्माता

आज़ादी के बाद जब संविधान सभा गठित हुई, तब डॉ. आंबेडकर को संविधान मसौदा समिति का अध्यक्ष चुना गया।

  • उन्होंने लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों को आधार बनाया।
  • संविधान में मौलिक अधिकारों और निर्देशात्मक सिद्धांतों का समावेश किया।
  • समाज के कमजोर वर्गों, दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों को विशेष सुरक्षा दी।
  • स्वतंत्र न्यायपालिका, संघीय ढाँचा और संसदीय व्यवस्था का ढांचा खड़ा किया।

इस तरह वे “भारतीय संविधान के शिल्पकार” कहलाए।

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भारतीय संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कई चुनौतियों का सामना किया। साथ ही, वे महिला सशक्तिकरण के भी दृढ़ समर्थक थे। यहाँ संविधान निर्माण की चुनौतियाँ और महिला सशक्तिकरण में उनके योगदान पर संक्षिप्त विवरण है।

संविधान निर्माण की चुनौतियाँ

  1. विविधता और समावेशिता:
    भारत एक विशाल और विविध राष्ट्र था जिसमें अनेक जातियां, धर्म, भाषाएं और सामाजिक प्रथाएं थीं। एक ऐसे संविधान का निर्माण करना जो सभी समूहों को समाहित कर सके, अत्यंत चुनौतीपूर्ण था।
  2. राजनीतिक मतभेद:
    स्वतंत्रता संग्राम में शामिल विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक समूहों के हित और विचार एक जैसे नहीं थे। साम्यवादियों, कांग्रेस, मुस्लिम लीग, और अन्य समूहों के बीच समन्वय आवश्यक था।
  3. भारत विभाजन का प्रभाव:
    1947 में भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ, जो संविधान निर्माताओं के लिए सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय संकट लेकर आया। विभाजित संसाधनों, शरणार्थियों और सांप्रदायिक दंगों ने प्रक्रिया को जटिल बनाया।
  4. संघीय बनाम एकात्मक व्यवस्था:
    राज्यों और केंद्र के बीच अधिकारों का वितरण एक बड़ा विवाद था। विभिन्न रियासतों का विलय और उनकी भागीदारी को शामिल करना भी चुनौतीपूर्ण था।
  5. संवैधानिक अधिकार और स्वतंत्रताएँ:
    मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करना और इनके दायरे का निर्धारण भी कठिन था, क्योंकि विभिन्न वर्गों के बीच इस पर अलग-अलग सोच थी।
  6. समय की कमी:
    संविधान को अपेक्षाकृत कम समय में पूरा करना आवश्यक था, क्योंकि देश को तत्काल एक स्थिर शासन की आवश्यकता थी।

डॉ. आंबेडकर ने इन चुनौतियों का सामना करते हुए संविधान में मौलिक अधिकारों, आरक्षण, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को सुनिश्चित किया।

महिला सशक्तिकरण में डॉ. आंबेडकर का योगदान

  1. भेदभाव और संघर्ष के खिलाफ आवाज:
    आंबेडकर ने महिलाओं समेत हर दलित और वंचित वर्ग के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उन्होंने महिला सशक्तिकरण को सामाजिक न्याय का अभिन्न हिस्सा माना।
  2. संवैधानिक अधिकार:
    डॉ. आंबेडकर ने संविधान निर्माताओं को प्रेरित किया कि महिलाओं को समान अधिकार मौलिक अधिकारों में शामिल किया जाए। इसके तहत महिलाओं को मतदान का अधिकार, शिक्षा और रोजगार में समानता दी गई।
  3. सामाजिक सुधार:
    वे बाल विवाह, दहेज प्रथा, विधवा पुनर्विवाह जैसे सामाजिक कुप्रथाओं के विरुद्ध थे। उन्होंने लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास किया।
  4. शिक्षा के माध्यम से सशक्तिकरण:
    महिलाओं की शिक्षा पर उन्होंने जोर दिया ताकि वे आर्थिक और सामाजिक रूप से स्वतंत्र बन सकें।
  5. राजनीतिक भागीदारी:
    महिलाओं को राजनीति में भागीदारी की घोषणा और प्रोत्साहन देने में डॉ. आंबेडकर अग्रणी थे।

संक्षेप में, डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने भारतीय संविधान को एक ऐसा दस्तावेज बनाया जिसमें सामाजिक न्याय, समानता और अधिकारों की गारंटी थी, और महिलाओं को भी इस न्याय व्यवस्था का केंद्र माना।

यदि इस विषय पर और अधिक विस्तार या विशिष्ट उदाहरण चाहिए तो बताएं।

डॉ. भीमराव आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच निम्नलिखित महत्वपूर्ण मतभेद थे, जिनका निपटारा 1932 में हुए पुणे पैक्ट (Poona Pact) द्वारा हुआ:

गांधी जी से डॉ. भीमराव आंबेडकर के मतभेद

  1. जाति व्यवस्था और दलित मुद्दे:
    गांधीजी ने प्रारंभ में जाति व्यवस्था को स्वीकार किया और दलितों को ‘हरिजन’ कहकर संबोधित किया, जबकि आंबेडकर ने इसे सामाजिक अन्याय का मूल कारण समझा और जाति प्रथा का पूरी तरह उन्मूलन चाहा।
  2. पृथक निर्वाचन क्षेत्र:
    अंबेडकर दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र के पक्ष में थे, जिससे वे अपने प्रतिनिधि स्वतंत्र रूप से चुन सकें। गांधीजी को यह विभाजनकारी लगा और उन्होंने इसका विरोध किया, साथ ही यरवदा जेल में अनशन पर बैठ गए।
  3. सामाजिक सुधार के तरीके:
    गांधी अहिंसा और सहयोग के माध्यम से सुधार चाहते थे, जबकि आंबेडकर ने कठोर विधिक व राजनीतिक उपायों को प्राथमिकता दी।

पुणे पैक्ट (1932) का महत्त्व

  • ब्रिटिश सरकार द्वारा दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र का प्रस्ताव हुआ था जिसे आंबेडकर ने स्वीकार किया था।
  • गांधीजी ने इसका विरोध में अनशन शुरू किया।
  • 24 सितंबर 1932 को पुणे में दोनों के बीच समझौता हुआ जिसे “पुणे पैक्ट” कहा गया।
  • इसमें पृथक निर्वाचन को त्याग दिया गया पर दलितों को आरक्षित सीटें दोगुनी कर दी गईं।
  • दलितों को प्रशासनिक और शैक्षणिक संस्थानों में विशेष अवसर उपलब्ध कराने पर सहमति हुई।

यह पैक्ट सामाजिक एकता और दलित अधिकारों के बीच संतुलन का प्रयास था, जिसमें आंबेडकर को कुछ समझौते करने पड़े, लेकिन दलितों के लिए राजनीतिक और सामाजिक अधिकार बढ़े।

राजनीति और आंदोलन

डॉ. अम्बेडकर ने “इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी” (1936) और “शेड्यूल कास्ट फेडरेशन” जैसी पार्टियों की स्थापना की।
वे आज़ाद भारत के पहले कानून मंत्री बने।

डॉ. भीमराव आंबेडकर का राजनीतिक जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बाद और स्वतंत्र भारत के गठन में एक महत्वपूर्ण अध्याय था। वे दलितों और हाशिए पर पड़े समाज के लिए न्याय, समानता और राजनीतिक अधिकारों के समर्थक थे। उनके राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों ने भारतीय समाज को गहराई से प्रभावित किया।

आंबेडकर का राजनीतिक और आंदोलनकारी जीवन

  1. दलित अधिकारों के लिए प्रारंभिक संघर्ष:
    1920 के दशक की शुरुआत में देश लौटने के बाद, डॉ. आंबेडकर ने दलितों की स्थिति सुधारने के लिए संघर्ष आरंभ किया। उन्होंने दलितों को संगठित करना शुरू किया और उनकी आवाज़ उठाने के लिए कई पत्रिकाएं जैसे “मूकनायक”, “बहिष्कृत भारत” आदि निकालीं।
  2. महाड़ सत्याग्रह (1927):
    महाराष्ट्र के महाड़ में दलितों को सार्वजनिक कुएँ और जल स्रोतों का उपयोग करने का अधिकार दिलाने के लिए उन्होंने सत्याग्रह किया। यह उनकी राजनीतिक सक्रियता का एक महत्वपूर्ण कदम था।
  3. कलाराम मंदिर आंदोलन (1930):
    दलितों को मंदिरों में प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए अंबेडकर ने नासिक के कलाराम मंदिर के बाहर आंदोलन किया, जिससे दलितों का सामाजिक समानता की ओर आंदोलन शुरू हुआ।
  4. राजनीतिक संगठन और पक्ष:
    • वर्ष 1924 में उन्होंने “बहिष्कृत हितकारी सभा” की स्थापना की, जो दलितों के कल्याण और राजनीतिक जागरूकता के लिए काम करती थी।
    • 1936 में “इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी” की स्थापना की, जो मजदूर और दलित वर्ग के हितों की पैरवी करती थी।
    • 1942 में इसे “शेड्यूल कास्ट संघ” में परिवर्तित किया गया।
  5. पूना पैक्ट (1932) और महात्मा गांधी से विवाद:
    उन्होंने दलितों के लिए पृथक निर्वाचन का समर्थन किया लेकिन गांधीजी के अनशन के कारण यह प्रस्ताव बदला गया। पुणे पैक्ट के माध्यम से दलितों को विधानसभाओं में आरक्षण मिला।
  6. स्वतंत्रता के बाद का राजनीतिक योगदान:
    • डॉ. आंबेडकर स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री बने।
    • वे संविधान सभा के अध्यक्ष थे और भारतीय संविधान के निर्माता थे।
    • उन्होंने कानून, सामाजिक न्याय, शिक्षा, और आर्थिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण नीतियाँ बनाईं।
  7. धर्म परिवर्तन और दलित बौद्ध आंदोलन:
    1956 में उन्होंने दलितों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली, जो सामाजिक समानता और आत्मसम्मान का आंदोलन था।

राजनीतिक विचार और दर्शन  

  • वे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, और सामाजिक न्याय के कट्टर समर्थक थे।
  • राज्य को कल्याणकारी और शक्तियों के विभाजन वाला मानते थे।
  • सत्ता का केंद्रीकरण वंशानुगत नहीं हो इसका जोर दिया।
  • उन्होंने जाति व्यवस्था, हिंदू धर्म के रूढ़िवादी पहलुओं और असमानता के खिलाफ तीव्र आलोचना की।

डॉ. भीमराव आंबेडकर का राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन आज भी भारत में दलित अधिकारों और सामाजिक समानता के लिए प्रेरणा स्रोत है। उनका जीवन दलितों के उत्थान और समान अधिकारों की लड़ाई का पर्याय बना।

स्वतंत्रता के बाद डॉ. आंबेडकर का राजनीतिक जीवन

स्वतंत्रता के बाद डॉ. भीमराव आंबेडकर का राजनीतिक जीवन भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण अध्याय था। वे स्वतंत्र भारत के पहले विधि एवं न्याय मंत्री बने और सामाजिक न्याय, आरक्षण, और संविधान निर्माण के क्षेत्र में गहरा प्रभाव डाला।

  1. स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि मंत्री:
    1947 में भारत की आज़ादी के बाद, डॉ. आंबेडकर को जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट में देश का पहला विधि और न्याय मंत्री बनाया गया। इस पद पर उन्होंने हिंदू कोड बिल (Hindu Code Bill) की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य महिला अधिकारों में सुधार करना और पारिवारिक कानूनों को सशक्त बनाना था। हालांकि यह बिल अंततः पारित नहीं हो पाया, जिसके कारण उन्होंने 1951 में मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
  2. संविधान सभा में भूमिका:
    स्वतंत्रता से पहले ही डॉ. आंबेडकर भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष थे और उन्होंने भारतीय संविधान के मूल ढांचे का निर्माण किया। संविधान में दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुनिश्चित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
  3. राजनीतिक दल और चुनाव:
    उन्होंने 1936 में इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना की, जिसे बाद में 1942 में अनुसूचित जाति संघ (Scheduled Caste Federation) में परिवर्तित किया गया।
    स्वतंत्र भारत में उन्होंने लोकसभा और राज्यसभा के चुनाव लड़ने का प्रयास किया, लेकिन चुनावों में उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली। 1952 के लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, बाद में वे राज्यसभा सदस्य बने।
  4. श्रम मंत्री के रूप में योगदान:
    1942 से 1946 के बीच डॉ. आंबेडकर वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम मंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने फैक्टरी अधिनियम 1946 और ट्रेड यूनियन अधिनियम 1947 जैसे महत्वपूर्ण श्रम सुधार लागू किए।
  5. सामाजिक और राजनीतिक विचार:
    डॉ. आंबेडकर लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और समानता के कट्टर समर्थक थे। वे राज्य के कल्याणकारी स्वरूप के पक्षधर थे और शक्ति के उचित विभाजन में विश्वास करते थे।
  6. आंदोलन और विरासत:
    स्वतंत्रता के बाद भी उन्होंने दलितों और अन्य वंचित वर्गों के लिए सामाजिक न्याय की लड़ाई जारी रखी। बौद्ध धर्म में धर्मांतरण भी इसी संघर्ष का हिस्सा था।

डॉ. भीमराव आंबेडकर का स्वतंत्रता के बाद का राजनीतिक जीवन सामाजिक न्याय, संवैधानिक सुधार और दलित अधिकारों के लिए समर्पित था। उन्होंने भारतीय लोकतंत्र के स्तंभ के रूप में संविधान निर्मित किया और समानता एवं स्वतंत्रता के लिए निरंतर संघर्ष किया।

धर्म परिवर्तन और बौद्ध धर्म की ओर

14 अक्टूबर 1956 को नागपुर (दीक्षाभूमि) में उन्होंने अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया।
उन्होंने जातिवाद और असमानता से मुक्ति के लिए बौद्ध धर्म को अपनाया।

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 1956 में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अपने और अपने लाखों समर्थकों के साथ हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म स्वीकार किया। यह धर्म परिवर्तन केवल धार्मिक निर्णय नहीं था, बल्कि भारतीय समाज में फैली जाति व्यवस्था और सामाजिक असमानता के खिलाफ एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन का प्रतीक था।

धर्म परिवर्तन की पृष्ठभूमि और कारण

डॉ. आंबेडकर ने इस्लाम, ईसाई, सिख धर्म सहित कई धर्मों का अध्ययन किया, लेकिन अंत में उन्होंने बौद्ध धर्म को चुना क्योंकि यह धर्म भारत की जन्मभूमि पर आधारित था और इसमें जातिवाद, असमानता की कोई जगह नहीं थी। उन्होंने महसूस किया कि बौद्ध धर्म ही ऐसा आदर्श धर्म है जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों को समर्पित है। उन्होंने कहा कि वे हिंदू धर्म के अनुयायी के रूप में जन्मे थे, लेकिन हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था उन्हें स्वीकार नहीं थी।

धर्म परिवर्तन का दिन और समारोह

14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में ‘दीक्षाभूमि’ पर डॉ. आंबेडकर ने अपने लगभग 3.65 लाख समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। उन्होंने पारंपरिक भिक्षु महास्थवीर चंद्रमणि के समक्ष ‘त्रिरत्न’ और ‘पंचशील’ का संकल्प लिया और बौद्ध धर्म अपनाया। इसी दिन दशहरा का पर्व भी मनाया जा रहा था, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।

डॉ. आंबेडकर की 22 प्रतिज्ञाएँ

धर्मांतरण के बाद डॉ. आंबेडकर ने अपने अनुयायियों को 22 प्रतिज्ञाएँ दिलाईं, जिनमें जाति व्यवस्था का पूर्ण रूप से त्याग, हिंसा का परित्याग, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों का पालन शामिल था। उन्होंने औपचारिक रूप से घोषणा की कि अब वे हिंदू धर्म के अनुयायी नहीं रहेंगे।

सामाजिक और राजनीतिक महत्व

डॉ. आंबेडकर का यह धर्मांतरण जातिवाद और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ एक निर्णायक कदम था। यह कदम समाज के शोषित वर्गों, खासकर दलितों के लिए नई उम्मीद और सम्मान का स्रोत बना। इसके साथ ही बौद्ध धर्म का पुनरुत्थान भी हुआ।

समापन

डॉ. बी.आर. आंबेडकर का बौद्ध धर्म अपनाना न केवल उनकी व्यक्तिगत आस्था का प्रतीक था, बल्कि यह भारतीय समाज में समानता, मानवाधिकार और न्याय के लिए उनके अथक संघर्ष का परिणाम था। यह धर्म परिवर्तन आज भी भारतीय सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में याद किया जाता है।

निधन एवं विरासत

6 दिसंबर 1956 को डॉ. अम्बेडकर का महापरिनिर्वाण हुआ। उन्हें बौद्ध परंपरा में अंतिम संस्कार दिया गया।

आज वे केवल भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में समानता और न्याय के प्रेरणास्रोत हैं।

उपसंहार

डॉ. बी.आर. अम्बेडकर का जीवन संघर्ष, शिक्षा और समर्पण की गाथा है। उन्होंने जिस भारत का सपना देखा था, वह आज भी हमें मार्गदर्शन देता है—

  • समानता का अधिकार
  • अस्पृश्यता का उन्मूलन
  • शिक्षा का प्रसार
  • मानवाधिकारों की सुरक्षा

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