पंडित जवाहरलाल नेहरू: आधुनिक भारत के निर्माता और राष्ट्रीय नेता

पंडित जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली नेताओं में से एक थे। वे भारत के पहले प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम से लेकर भारत की आज़ादी के बाद राष्ट्र निर्माण तक के सफर में अहम भूमिका निभाई। नेहरू जी का व्यक्तित्व, उनकी दूरदर्शिता, और उनका समर्पण भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है।
जीवन परिचय
- जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 को इलाहाबाद
- पिता मोतीलाल नेहरू
- माता स्वरूपरानी
- पंडित जवाहरलाल नेहरू की पत्नी का नाम कमला नेहरू
- पुत्री का नाम इंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी
- शिक्षा – कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से प्राकृतिक विज्ञान में स्नातक की डिग्री
- ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में विधि (कानून) की पढ़ाई
- पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री थे
- उन्होंने 15 अगस्त 1947 से लेकर 27 मई 1964 तक
- लगभग 16 वर्ष और 286 दिन
- उनका निधन 27 मई 1964 को हुआ
व्यक्तिगत जीवन
जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 को इलाहाबाद में हुआ था। उनके पिता मोतीलाल नेहरू एक समृद्ध वकील और स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता थे। माता स्वरूपरानी एक घरेलू महिला थीं। नेहरू की प्रारंभिक शिक्षा घर पर हुई, फिर वे इंग्लैंड गए, जहां उन्होंने हैरो स्कूल और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद वे वकालत की पढ़ाई पूरी करके भारत लौटे।
1916 में उनका विवाह कमला नेहरू से हुआ, जिनके साथ उनका एक पुत्री थी — इंदिरा गांधी, जो बाद में भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। नेहरू जी का परिवार संस्कारवादी, शिक्षित और समाजसेवक था।
नेहरूजी अपने निजी जीवन में सादगी, अनुशासन और उच्च नैतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध थे। वे नौ बार जेल गए, अपनी पत्नी और बच्चों की देखभाल के साथ साथ भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय थे। नेहरूजी का बच्चों के प्रति विशेष स्नेह था, जिसके कारण उनके जन्मदिन 14 नवंबर को राष्ट्रीय बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
1912 में भारत लौटने के तुरंत बाद उन्होंने वकालत शुरू की, लेकिन जल्दी ही राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हो गए। 1916 में उन्हें महात्मा गांधी से मिलने का अवसर मिला, जिन्होंने नेहरू के राजनीतिक और नैतिक जीवन को प्रभावित किया। महात्मा गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांतों को अपनाकर नेहरू ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में प्रमुख नेतृत्व किया।
जवाहरलाल नेहरू का स्वतंत्रता संग्राम में नेहरू का योगदान
पंडित जवाहरलाल नेहरू का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान अतुलनीय और बहुआयामी था। वे महात्मा गांधी के सहयोगी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में से एक थे, जिन्होंने भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने के लिए कई आंदोलन और रणनीतियों का नेतृत्व किया।
- राष्ट्रीय कांग्रेस में सक्रिय सदस्य: 1912 में भारत लौटने के बाद नेहरू ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सत्रों में सक्रिय भाग लेना शुरू किया। वे 1923 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव चुने गए, जहाँ उन्होंने संगठन को मजबूत किया और स्वतंत्रता संग्राम को जन-जन तक पहुँचाने में प्रभावी योगदान दिया।
- होम रूल लीग और असहयोग आंदोलन में भूमिका: 1916 में नेहरू होम रूल लीग के संयुक्त सचिव बने जिससे भारतीयों में स्वशासन की भावना जागी। 1920 के असहयोग आंदोलन में वह जनता को संगठित कर अंग्रेजों के खिलाफ आन्दोलन चलाने में अग्रणी रहे।
- नए युवा नेता के रूप में उभरना: 1928-29 के साइमन कमीशन विरोधी आंदोलन में नेहरू सुभाष चंद्र बोस के साथ युवा नेतृत्व की नई लहर लेकर आये। उन्होंने लाहौर कांग्रेस अधिवेशन 1929 में कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में ‘पूर्ण स्वराज’ की मांग की। 26 जनवरी 1930 को भारत के स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव दिया।
- सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन: नेहरू ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन और बाद में 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में निर्णायक भूमिका निभाई। इसके कारण वे कई बार जेल गए पर लड़ाई जारी रखी।
- युवा पीढ़ी को प्रेरित करना: नेहरू ने युवाओं में राष्ट्रीय चेतना जगाई और उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदार बनाया। उनकी प्रेरणा के कारण युवा वर्ग स्वतंत्रता आंदोलन में बड़ी संख्या में शामिल हुआ।
- सामाजिक समानता और न्याय के लिए संघर्ष: नेहरू ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान न केवल राजनीतिक स्वतंत्रता बल्कि समाज में सामाजिक न्याय, समानता और आर्थिक सुधार के लिए भी आवाज उठाई।
- स्वतंत्र भारत की नींव: स्वतंत्रता मिलने के बाद वे भारत के पहले प्रधानमंत्री बने और आधुनिक भारत के निर्माण के लिए दिशा-निर्देशित योजनाओं को लागू किया।
नेहरू जी का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान केवल राजनीतिक नेतृत्व तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने भारतीय समाज को न्याय, समरसता और विकास के मार्ग पर ले जाने का काम किया। उनके नेतृत्व और विचारों ने भारत को एक स्वतंत्र, समृद्ध और आधुनिक राष्ट्र बनने में मदद दी.
नेहरू जी ने 1919 के रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी शुरू की। उन्होंने असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा, और भारत छोड़ो आंदोलन में महात्मा गांधी के साथ मिलकर नेतृत्व दिया। वे कई बार जेल गए और स्वतंत्रता संग्राम की अग्निपरीक्षा में खुद को परखा।
नेहरू 1929 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में “पूर्ण स्वराज” की मांग लेकर आए, जहां उन्होंने भारत के स्वतंत्रता की दिशा में निर्णायक कदम उठाए। उनकी भाषा और विचारधारा ने युवाओं को प्रेरित किया, जो बाद में आंदोलन के सबसे सक्रिय कार्यकर्ता बने।
भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में भूमिका

15 अगस्त 1947 को भारत ने अंग्रेजों से स्वतंत्रता हासिल की, और पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। उनके नेतृत्व में भारत ने अनेक महत्वपूर्ण सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक सुधार किए। उन्होंने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी और लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने में मुख्य भूमिका निभाई।
उनके कार्यकाल के दौरान भारतीय संविधान का निर्माण हुआ और 1950 में भारत को गणराज्य का दर्जा मिला। उन्होंने पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत की, जिससे देश का आर्थिक विकास और औद्योगिककरण तेज हुआ। उन्होंने शिक्षा, विज्ञान, और तकनीकि को बढ़ावा दिया, जिससे भारत ने परमाणु और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में कदम बढ़ाए।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में 15 अगस्त 1947 से 27 मई 1964 तक कार्य किया। उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल को आधुनिक भारत की नींव माना जाता है।
- स्वतंत्र भारत का नेतृत्व: भारत के स्वतंत्र होने के बाद, नेहरू को कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री चुना गया। वे राष्ट्र की नई समस्याओं से निपटने के लिए एक सशक्त और समर्पित नेतृत्व प्रदान करते रहे।
- संविधान निर्माण: उनका कार्यकाल भारतीय संविधान के लागू होने का महत्वपूर्ण समय था। उन्होंने भारत को एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और गणराज्य के रूप में स्थापित किया।
- आर्थिक और औद्योगिक विकास: नेहरू ने पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत की, जिससे भारत में औद्योगिकीकरण और कृषि विकास को बल मिला। उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग और वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहित किया।
- वैज्ञानिक और तकनीकी उन्नति: नेहरू ने विज्ञान और तकनीक को महत्व दिया। उनके प्रयासों से भारत में प्रमुख वैज्ञानिक संस्थान स्थापित हुए, जैसे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IITs)।
- विदेश नीति: वह गुट निरपेक्ष आंदोलन के मुख्य संस्थापकों में से एक थे। उन्होंने भारत की विदेश नीति को शांति, सहयोग और स्वतंत्रता की नीति पर रखा।
- समाजिक और सांस्कृतिक सुधार: नेहरू ने समाज के पिछड़े वर्गों के उत्थान, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा समेत कई क्षेत्रों में सुधार की पहल की।
- भारत के एकीकरण की प्रक्रिया: विभाजन के बाद देश में हजारों रियासतों को एकीकृत करने का काम उन्होंने सफलतापूर्वक किया।
नेहरू का प्रधानमंत्री कार्यकाल भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने, आर्थिक विकास को गति देने, वैश्विक मंच पर देश की स्थिति को बेहतर बनाने और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को सुदृढ़ करने का प्रतीक रहा। उनका निधन 27 मई 1964 को हुआ, परन्तु उनके विचार और योगदान आज भी भारत के मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण हैं.
नेहरू जी के सामाजिक और आर्थिक विचार
नेहरू जी का मानना था कि देश की प्रगति के लिए आर्थिक विकास आवश्यक है, किन्तु सामाजिक न्याय को भी समान रूप से महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने दलितों, आदिवासियों और महिलाओं के अधिकारों की वकालत की। वे भारत के सबसे बड़े रचनाकारों में से एक थे, जिन्होंने स्वयं के जीवन में सादगी, अनुशासन और नैतिकता को अपनाया।
पंडित जवाहरलाल नेहरू के सामाजिक और आर्थिक विचार उनके दूरदर्शी और समावेशी दृष्टिकोण का परिचायक थे। उन्होंने आधुनिक भारत को एक समृद्ध, समान और प्रगतिशील राष्ट्र बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सिद्धांत और नीतियां विकसित कीं।
सामाजिक विचार
- मानवतावाद और सामाजिक न्याय: नेहरू जी मानवतावाद में विश्वास रखते थे। वे प्रत्येक व्यक्ति के अंदर अंतर्निहित मूल्य और गरिमा को महत्व देते थे। उनके अनुसार सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और मानव अधिकार किसी राष्ट्र की स्थिरता के लिए आवश्यक हैं। उन्होंने जाति, धर्म, और अन्य सामाजिक बंधनों के विरुद्ध आधारित समाज की कल्पना की, जिसमें सभी को समान अधिकार और अवसर मिलें।
- धर्मनिरपेक्षता: नेहरू भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में विश्वास रखते थे। उन्होंने सभी धर्मों का सम्मान और समानता पर जोर दिया, जिससे देश में सांप्रदायिक सद्भाव और एकता बनी रहे। धर्मनिरपेक्षता उनके विचारधारा की एक प्रमुख धुरी थी।
- शिक्षा और महिला सशक्तिकरण: वे शिक्षा की व्यापक पहुँच और गुणवत्ता में सुधार के पक्षधर थे। साथ ही महिलाओं की भूमिका को सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक क्षेत्र में सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध थे।
आर्थिक विचार
- समाजवाद और मिश्रित अर्थव्यवस्था: नेहरू का आर्थिक दर्शन समाजवादी विचारधारा पर आधारित था, लेकिन यह रूसी या पूर्वी यूरोपीय समाजवाद का अनुकरण नहीं था। वे मिश्रित अर्थव्यवस्था के समर्थक थे, जिसमें सरकारी क्षेत्र और निजी क्षेत्र दोनों होते। इसका उद्देश्य सामाजिक समानता और आर्थिक विकास को संतुलित करना था।
- योजनागत विकास: नेहरू ने पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत की, जो देश के आर्थिक विकास की दिशा निर्धारित करती थीं। योजनाओं के तहत औद्योगिकीकरण, कृषि सुधार, आधारभूत संरचना विकास और सामाजिक कल्याण के महत्वपूर्ण पहलुओं पर काम हुआ।
- औद्योगिक और कृषि विकास: नेहरू ने भारी उद्योगों और सार्वजनिक क्षेत्र के विकास को प्राथमिकता दी। साथ ही, कृषि सुधारों के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने का प्रयास किया।
- राष्ट्रीयकरण: उन्होंने बैंकों, बीमा, और भारी उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया ताकि संसाधनों का अधिकतम लाभ समाज के सभी वर्गों को मिल सके।
- आत्मनिर्भरता: नेहरू ने देश की आत्मनिर्भरता को एक मजबूत आर्थिक आधार माना, जिसमें विज्ञान और तकनीक की उन्नति का विशेष स्थान था।
नेहरू की सामाजिक और आर्थिक नीतियां भारत को एक व्यापक और समृद्ध राष्ट्र बनाने के लिए मार्गप्रशस्त थीं। उन्होंने सामाजिक समानता, आर्थिक न्याय, और वैज्ञानिक विकास को भारतीय राष्ट्र के मूल स्तंभ बनाया। उनकी योजनाबद्ध नीतियों ने भारत को एक आधुनिक राष्ट्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया. उनके आर्थिक नीतियों में एक समतामूलक समाज की स्थापना का लक्ष्य था, जहां संसाधन सभी के लिए उपलब्ध हों।
नेहरू की अंतरराष्ट्रीय विदेश नीति के प्रमुख पहलू

नेहरू ने भारत की विदेश नीति को भी मजबूती दी और स्वतंत्रता प्राप्त देशों की आवाज उठाने के लिए गैर संरेखित आंदोलन (Non-Aligned Movement) की स्थापना में अग्रणी भूमिका निभाई। वे शीत युद्ध के दौरान दो बड़े देशों के बीच भारत को तटस्थ और स्वतंत्र बनाए रखने वाले नेता थे। भारत ने उनके मार्गदर्शन में दक्षिण एशिया के राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पंडित जवाहरलाल नेहरू की विदेश नीति आधुनिक भारत की विदेश नीति की नींव बनी और उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को एक स्वतंत्र, समर्पित और सम्मानित राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।
- स्वतंत्रता और राष्ट्रीय संप्रभुता का संरक्षण: नेहरू की विदेश नीति का मुख्य आधार था भारत की सम्पूर्ण राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान। वे चाहते थे कि भारत पूरी तरह से स्वतंत्र रहे और किसी भी बाहरी शक्ति के दबाव में न आए।
- पंचशील सिद्धांत: नेहरू ने चीन के साथ 1954 में पंचशील का समझौता किया, जिसमें पांच प्रमुख नियम थे:
- गुट निरपेक्षता: शीत युद्ध के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच टकराव के चलते नेहरू ने भारत को किसी भी सैन्य गुट से दूर रखने और स्वायत्त विदेश नीति अपनाने की राह दिखाई। उन्होंने गुट निरपेक्ष आंदोलन की बुनियाद रखी ताकि विकासशील देश अपनी स्वतंत्रता और हितों की रक्षा कर सकें।
- शांति और विश्व सहिष्णुता: नेहरू ने विश्व में शांति और सहयोग को बढ़ावा देने पर जोर दिया। उन्होंने भारतीय विदेश नीति को मानवतावाद, न्याय और विश्वस्तर पर शांति सिद्धांतों पर आधारित किया।
- औपनिवेशिकता के विरुद्ध समर्थन: नेहरू ने अफ्रीका, एशिया और अन्य उपनिवेशित देशों के स्वतंत्रता संग्रामों का समर्थन किया और विश्व मंच पर उनके लिए आवाज उठाई।
- चुनौतियाँ और आलोचना: नेहरू की विदेश नीति कुछ बार सिद्धांतों के आधार पर होने के कारण आलोचना का भी विषय बनी। 1962 में भारत-चीन युद्ध में भारत की सैन्य असमर्थता और सुरक्षा की कमज़ोरी उजागर हुई।
नेहरू की विदेश नीति ने भारत को विश्व स्तर पर एक सम्मानित, स्वतंत्र और शांतिपूर्ण राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। गुट निरपेक्षता और पंचशील ने भारत को वैश्विक राजनीति में स्वतंत्र आवाज़ दी, जो नए स्वतंत्र राष्ट्रों के लिए एक मॉडल साबित हुई।
नेहरू की विदेश नीति आज भी भारत की विदेश नीति के मूल आधारों में से एक है, जिसने देश को वैश्विक संबंधों में मजबूती और संघर्षों के समय में संतुलन बनाए रखने में सहारा दिया.
यदि आप चाहें तो इस विषय पर और विस्तार से जानकारी दे सकता हूँ।पंडित जवाहरलाल नेहरू की विदेश नीति आधुनिक भारत की विदेश नीति की नींव बनी और उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को एक स्वतंत्र, समर्पित और सम्मानित राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।
नेहरू की अंतरराष्ट्रीय विदेश नीति के प्रमुख पहलू:
- स्वतंत्रता और राष्ट्रीय संप्रभुता का संरक्षण: नेहरू की विदेश नीति का मुख्य आधार था भारत की सम्पूर्ण राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान। वे चाहते थे कि भारत पूरी तरह से स्वतंत्र रहे और किसी भी बाहरी शक्ति के दबाव में न आए।
- पंचशील सिद्धांत: नेहरू ने चीन के साथ 1954 में पंचशील का समझौता किया, जिसमें पांच प्रमुख नियम थे:
- क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का आपसी सम्मान।
- एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में गैर-दखल।
- शांति और मित्रता के सिद्धांत।
- समानता और आपसी लाभ।
- संघर्षों का शांतिपूर्ण समाधान।
- गुट निरपेक्षता: शीत युद्ध के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच टकराव के चलते नेहरू ने भारत को किसी भी सैन्य गुट से दूर रखने और स्वायत्त विदेश नीति अपनाने की राह दिखाई। उन्होंने गुट निरपेक्ष आंदोलन की बुनियाद रखी ताकि विकासशील देश अपनी स्वतंत्रता और हितों की रक्षा कर सकें।
- शांति और विश्व सहिष्णुता: नेहरू ने विश्व में शांति और सहयोग को बढ़ावा देने पर जोर दिया। उन्होंने भारतीय विदेश नीति को मानवतावाद, न्याय और विश्वस्तर पर शांति सिद्धांतों पर आधारित किया।
- औपनिवेशिकता के विरुद्ध समर्थन: नेहरू ने अफ्रीका, एशिया और अन्य उपनिवेशित देशों के स्वतंत्रता संग्रामों का समर्थन किया और विश्व मंच पर उनके लिए आवाज उठाई।
- चुनौतियाँ और आलोचना: नेहरू की विदेश नीति कुछ बार सिद्धांतों के आधार पर होने के कारण आलोचना का भी विषय बनी। 1962 में भारत-चीन युद्ध में भारत की सैन्य असमर्थता और सुरक्षा की कमज़ोरी उजागर हुई।
नेहरू की विदेश नीति ने भारत को विश्व स्तर पर एक सम्मानित, स्वतंत्र और शांतिपूर्ण राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। गुट निरपेक्षता और पंचशील ने भारत को वैश्विक राजनीति में स्वतंत्र आवाज़ दी, जो नए स्वतंत्र राष्ट्रों के लिए एक मॉडल साबित हुई।
नेहरू की विदेश नीति आज भी भारत की विदेश नीति के मूल आधारों में से एक है, जिसने देश को वैश्विक संबंधों में मजबूती और संघर्षों के समय में संतुलन बनाए रखने में सहारा दिया.
व्यक्तिगत जीवन और विरासत
नेहरूजी का बच्चो में विशेष स्थान था इसलिए उनका जन्मदिन 14 नवंबर ‘बाल दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। वे क्रांतिकारी, लेखक, दार्शनिक और शिक्षक भी थे। उनकी पुस्तक “आत्मकथा” और “डिस्कवरी ऑफ इंडिया” आज भी भारत और विश्व में पढ़ी जाती हैं।
विरासत
- स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख नेतृत्व: नेहरू ने महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नेतृत्व किया और स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बनें।
- आधुनिक भारत के निर्माता: नेहरू ने भारत को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से आधुनिक राष्ट्र में बदलने का कार्य किया। उन्होंने पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत कर औद्योगिक और वैज्ञानिक विकास को बढ़ावा दिया।
- धर्मनिरपेक्षता के प्रबल समर्थक: उन्होंने भारत को धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बनाया, जहाँ सभी धर्मों को समान अधिकार और सम्मान मिले।
- वैश्विक मंच पर भारत की पहचान: नेहरू के नेतृत्व में भारत ने स्वतंत्र और स्वायत्त विदेश नीति अपनाई, जिससे भारत विश्व में सम्मानित राष्ट्र बना।
- शिक्षा और विज्ञान के प्रचारक: उन्होंने विज्ञान, तकनीक और शिक्षा को देश के विकास का आधार माना और कई प्रमुख शैक्षिक एवं वैज्ञानिक संस्थानों की स्थापना की।
- समानता और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष: नेहरू ने समाज के पिछड़े वर्गों और महिलाओं के अधिकारों के लिए काम किया।
नेहरू की जीवन यात्रा और उनके विचार आज भी भारतीय राजनीति, समाज और शिक्षा के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। वे ‘चाचा नेहरू’ के रूप में बच्चों और युवाओं में अत्यंत प्रिय हैं और उनका नाम इतिहास में एक महान राष्ट्रवादी, दार्शनिक और नेता के रूप में अमर है.
27 मई 1964 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनका सपना, विचार और योगदान आज भी भारत को प्रगति की ओर ले जा रहे हैं।

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